दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूत॥
(UPSC 1981, 20 Marks, )
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दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूत॥
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