कबीर राम ध्याइ लै, जिभ्या सौं करि मंत। हरि साग जिनि बीसरै, छीलर देखि अनंत। नैंना नीझर लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं, कबरू मिलहुगे राम॥ सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणा अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥ (UPSC 1986, 20 Marks, )

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