कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूँण। जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण॥ मेरा मन सुमिरै राम कूँ, मेरा मन रामहिं आहि। अब मन रामहिं ह्नै रह्या, सीस नवावौं काहि। चकवी बिछुरी रेन की, आइ मिली परभाति। जों जन बिछुरे राम से, ते दिन मिले न 'राति॥ (UPSC 1989, 20 Marks, )

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