बिरहा बुरहा जिति कहौ, बिरहा है सुलितान। जिस घर बिरहा न संचरै, सो घर सदा मसान।। इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव। लोही सींचौ तेल ज्यूँ, कब मुख देखौ पीव।। (UPSC 2001, 20 Marks, )

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