सुरति समाँणो निरति मैं, निरति रही निरधार। सुरति निरति परचा भया, तब खूले स्यंभ दुवार॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति॥ (UPSC 1984, 20 Marks, )

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