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तुलसीदास की भक्ति वर्ण, जाति, धर्म आदि के कारण किसी का बहिष्कार नहीं करती। जो “अति अघ-रूप” समझे जाते हैं, उन “आभीर जवन किरात खस स्वपचादि” के लिए भी वह कहते हैं कि राम का नाम लेकर वे भी पवित्र हो जाते हैं। इससे उनकी भक्ति का जनवादी तत्त्व अच्छी तरह प्रकट हो जाता है। जिन तमाम लोगों के लिए पुरोहित वर्ग ने उपासना और मुक्ति के द्वार बन्द कर दिये थे, उन सब के लिए तुलसी ने उन्हें खोल दिया। तुलसी की जाति और कुलीनता पर पुरोहितों के आक्षेपों का यही कारण था। (UPSC 2013, 10 Marks, )

तुलसीदास की भक्ति वर्ण, जाति, धर्म आदि के कारण किसी का बहिष्कार नहीं करती। जो “अति अघ-रूप” समझे जाते हैं, उन “आभीर जवन किरात खस स्वपचादि” के लिए भी वह कहते हैं कि राम का नाम लेकर वे भी पवित्र हो जाते हैं। इससे उनकी भक्ति का जनवादी तत्त्व अच्छी तरह प्रकट हो जाता है। जिन तमाम लोगों के लिए पुरोहित वर्ग ने उपासना और मुक्ति के द्वार बन्द कर दिये थे, उन सब के लिए तुलसी ने उन्हें खोल दिया। तुलसी की जाति और कुलीनता पर पुरोहितों के आक्षेपों का यही कारण था।
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उत्पीड़ित होकर भी वह शरण पाये है। आशरण हो वह कहाँ जायेगी। वर्षा में गृहविज्ञान स्तम्भ की ओट पाने का ही यत्न करता है.....। उनके नेत्र भीग गये और वह मौन रह गई। सोचा—प्रतूल और अंजना भी उसके दुर्भाग्य का रहस्य जानते हैं, इसलिए स्थूल बन्धनों का उपयोग करना आवश्यक नहीं समझते। स्थूल बन्धनों से कहीं अधिक दृढ़ परिस्थिति के सूक्ष्म, अदृश्य बंधन ही उसे बांधे हैं। (UPSC 2001, 20 Marks, )

उत्पीड़ित होकर भी वह शरण पाये है। आशरण हो वह कहाँ जायेगी। वर्षा में गृहविज्ञान स्तम्भ की ओट पाने का ही यत्न करता है.....। उनके नेत्र भीग गये और वह मौन रह गई। सोचा—प्रतूल और अंजना भी उसके दुर्भाग्य का रहस्य जानते हैं, इसलिए स्थूल बन्धनों का उपयोग करना आवश्यक नहीं समझते। स्थूल बन्धनों से कहीं अधिक दृढ़ परिस्थिति के सूक्ष्म, अदृश्य बंधन ही उसे बांधे हैं।
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कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूर्व और अपर समुद्र—महोदधि और रत्नाकर—दोनों को दोनों भुजाओं से थामता हुआ हिमालय “पृथ्वी का मानदण्ड” कहा जाय तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। (निबंध-निलय, सम्पादक सत्येन्द्र, में संकलित निबंध 'कुटज', हजारीप्रसाद द्विवेदी से, पृष्ठ 228) (UPSC 2000, 20 Marks, )

कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूर्व और अपर समुद्र—महोदधि और रत्नाकर—दोनों को दोनों भुजाओं से थामता हुआ हिमालय “पृथ्वी का मानदण्ड” कहा जाय तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। (निबंध-निलय, सम्पादक सत्येन्द्र, में संकलित निबंध 'कुटज', हजारीप्रसाद द्विवेदी से, पृष्ठ 228)
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