काव्य-साहित्य और अन्य कलाएँ मूलतः सृजनात्मक हैं, अतः उनमें राजनीति के कार्य-विभाजन जैसा कोई विभाजन संभव ही नहीं होता। कोई भी सच्चा कलाकार ध्वंसयुग का अग्रदूत रहकर निर्माण का भार दूसरों पर नहीं छोड़ सकता, क्योंकि उसकी रचना तो निर्माण तक पहुँचने के लिए ही ध्वंस का पथ पार करती है। (UPSC 2022, 10 Marks, )
काव्य-साहित्य और अन्य कलाएँ मूलतः सृजनात्मक हैं, अतः उनमें राजनीति के कार्य-विभाजन जैसा कोई विभाजन संभव ही नहीं होता। कोई भी सच्चा कलाकार ध्वंसयुग का अग्रदूत रहकर निर्माण का भार दूसरों पर नहीं छोड़ सकता, क्योंकि उसकी रचना तो निर्माण तक पहुँचने के लिए ही ध्वंस का पथ पार करती है।View Answer
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जिसका मन अपने वश में नहीं है, वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है, अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज सब मिथ्याचारों से मुक्त है। वह वशी है। वह वैरागी है। (UPSC 2022, 10 Marks, )
जिसका मन अपने वश में नहीं है, वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है, अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज सब मिथ्याचारों से मुक्त है। वह वशी है। वह वैरागी है।View Answer
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साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है--उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है। (UPSC 2021, 10 Marks, )
साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है--उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।View Answer
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तुलसीदास की भक्ति वर्ण, जाति, धर्म आदि के कारण किसी का बहिष्कार नहीं करती। जो “अति अघ-रूप” समझे जाते हैं, उन “आभीर जवन किरात खस स्वपचादि” के लिए भी वह कहते हैं कि राम का नाम लेकर वे भी पवित्र हो जाते हैं। इससे उनकी भक्ति का जनवादी तत्त्व अच्छी तरह प्रकट हो जाता है। जिन तमाम लोगों के लिए पुरोहित वर्ग ने उपासना और मुक्ति के द्वार बन्द कर दिये थे, उन सब के लिए तुलसी ने उन्हें खोल दिया। तुलसी की जाति और कुलीनता पर पुरोहितों के आक्षेपों का यही कारण था। (UPSC 2013, 10 Marks, )
तुलसीदास की भक्ति वर्ण, जाति, धर्म आदि के कारण किसी का बहिष्कार नहीं करती। जो “अति अघ-रूप” समझे जाते हैं, उन “आभीर जवन किरात खस स्वपचादि” के लिए भी वह कहते हैं कि राम का नाम लेकर वे भी पवित्र हो जाते हैं। इससे उनकी भक्ति का जनवादी तत्त्व अच्छी तरह प्रकट हो जाता है। जिन तमाम लोगों के लिए पुरोहित वर्ग ने उपासना और मुक्ति के द्वार बन्द कर दिये थे, उन सब के लिए तुलसी ने उन्हें खोल दिया। तुलसी की जाति और कुलीनता पर पुरोहितों के आक्षेपों का यही कारण था।View Answer
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उत्पीड़ित होकर भी वह शरण पाये है। आशरण हो वह कहाँ जायेगी। वर्षा में गृहविज्ञान स्तम्भ की ओट पाने का ही यत्न करता है.....। उनके नेत्र भीग गये और वह मौन रह गई। सोचा—प्रतूल और अंजना भी उसके दुर्भाग्य का रहस्य जानते हैं, इसलिए स्थूल बन्धनों का उपयोग करना आवश्यक नहीं समझते। स्थूल बन्धनों से कहीं अधिक दृढ़ परिस्थिति के सूक्ष्म, अदृश्य बंधन ही उसे बांधे हैं। (UPSC 2001, 20 Marks, )
उत्पीड़ित होकर भी वह शरण पाये है। आशरण हो वह कहाँ जायेगी। वर्षा में गृहविज्ञान स्तम्भ की ओट पाने का ही यत्न करता है.....। उनके नेत्र भीग गये और वह मौन रह गई। सोचा—प्रतूल और अंजना भी उसके दुर्भाग्य का रहस्य जानते हैं, इसलिए स्थूल बन्धनों का उपयोग करना आवश्यक नहीं समझते। स्थूल बन्धनों से कहीं अधिक दृढ़ परिस्थिति के सूक्ष्म, अदृश्य बंधन ही उसे बांधे हैं।Enroll Now
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कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूर्व और अपर समुद्र—महोदधि और रत्नाकर—दोनों को दोनों भुजाओं से थामता हुआ हिमालय “पृथ्वी का मानदण्ड” कहा जाय तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। (निबंध-निलय, सम्पादक सत्येन्द्र, में संकलित निबंध 'कुटज', हजारीप्रसाद द्विवेदी से, पृष्ठ 228) (UPSC 2000, 20 Marks, )
कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूर्व और अपर समुद्र—महोदधि और रत्नाकर—दोनों को दोनों भुजाओं से थामता हुआ हिमालय “पृथ्वी का मानदण्ड” कहा जाय तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। (निबंध-निलय, सम्पादक सत्येन्द्र, में संकलित निबंध 'कुटज', हजारीप्रसाद द्विवेदी से, पृष्ठ 228)Enroll Now
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