उत्पीड़ित होकर भी वह शरण पाये है। आशरण हो वह कहाँ जायेगी। वर्षा में गृहविज्ञान स्तम्भ की ओट पाने का ही यत्न करता है.....। उनके नेत्र भीग गये और वह मौन रह गई। सोचा—प्रतूल और अंजना भी उसके दुर्भाग्य का रहस्य जानते हैं, इसलिए स्थूल बन्धनों का उपयोग करना आवश्यक नहीं समझते। स्थूल बन्धनों से कहीं अधिक दृढ़ परिस्थिति के सूक्ष्म, अदृश्य बंधन ही उसे बांधे हैं। (UPSC 2001, 20 Marks, )

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