कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूर्व और अपर समुद्र—महोदधि और रत्नाकर—दोनों को दोनों भुजाओं से थामता हुआ हिमालय “पृथ्वी का मानदण्ड” कहा जाय तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। (निबंध-निलय, सम्पादक सत्येन्द्र, में संकलित निबंध 'कुटज', हजारीप्रसाद द्विवेदी से, पृष्ठ 228) (UPSC 2000, 20 Marks, )

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