"बुद्धि की क्रिया से हमारा ज्ञान जिस अद्वैत भूमि पर पहुँचता पहुँचता है, उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय भी इस सत्त्व-रस के प्रभाव से पहुँचता है। इस प्रकार अंत में जाकर दोनों पक्षों की का समन्वय हो जाता है। इस समन्वय के बिना मनुष्यत्व की साधना पूरी नहीं हो सकती।" (UPSC 2014, 10 Marks, )

"बुद्धि की क्रिया से हमारा ज्ञान जिस अद्वैत भूमि पर पहुँचता पहुँचता है, उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय भी इस सत्त्व-रस के प्रभाव से पहुँचता है। इस प्रकार अंत में जाकर दोनों पक्षों की का समन्वय हो जाता है। इस समन्वय के बिना मनुष्यत्व की साधना पूरी नहीं हो सकती।"