सो गढ़ देखु गँगन तें ऊँचा। नैन देख कर नाहिं पहुँचा। बिजुरी चक्र फिरै चहुँ फेरी। औ जमकात फिर जय केरी। धाइ जो बाजा कै मन साधा। मारा चक्र भएउ दुइ आधा। चंद सुरुज औ नखत तराई। तेहि डर अँतरिख फिरैं सबाई। पवन जाइ तहँ पहुँचे चहा। मारा तैस टूटि भुईँ बहा। अगिनि उठी जरि बुझी निआना। धुआँ उठा उठि बीच बिलाना। पानि उठा उठि जाइ न छुवा। बहुरा रोइ आइ भुँइ चुवा। रावण चहा सौंह होइ हेरा उतरि गए दस माँथ। संकर धरा ललाट भुदें औरु को जोगी नाथ।। (UPSC 2012, 12 Marks, )

सो गढ़ देखु गँगन तें ऊँचा। नैन देख कर नाहिं पहुँचा। बिजुरी चक्र फिरै चहुँ फेरी। औ जमकात फिर जय केरी। धाइ जो बाजा कै मन साधा। मारा चक्र भएउ दुइ आधा। चंद सुरुज औ नखत तराई। तेहि डर अँतरिख फिरैं सबाई। पवन जाइ तहँ पहुँचे चहा। मारा तैस टूटि भुईँ बहा। अगिनि उठी जरि बुझी निआना। धुआँ उठा उठि बीच बिलाना। पानि उठा उठि जाइ न छुवा। बहुरा रोइ आइ भुँइ चुवा। रावण चहा सौंह होइ हेरा उतरि गए दस माँथ। संकर धरा ललाट भुदें औरु को जोगी नाथ।।
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