पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस मेरी बाहों की जकड़ कसती जाती है; कसती जाती है। रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था। (UPSC 2012, 12 Marks, )

Enroll Now