रूप का आकर्षण तो उन पर कोई असर न कर सकता था। ब्रह्मगुण का आकर्षण था। वे यह जानते थे; जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं; केवल एक बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम होता है, यह तो रूप की आसक्ति मात्र है, जिसका कोई टिकाव नहीं। अगर इसके पहले यह निश्चय तो कर लेना ही था कि वह पत्थर साहचर्य के खराद पर चढ़ेगा, उसमें खरादे जाने की क्षमता है भी या नहीं। सभी पत्थर तो खराद पर चढ़कर सुंदर मूर्तियाँ नहीं बन जाते।
(UPSC 1989, 20 Marks, )
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रूप का आकर्षण तो उन पर कोई असर न कर सकता था। ब्रह्मगुण का आकर्षण था। वे यह जानते थे; जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं; केवल एक बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम होता है, यह तो रूप की आसक्ति मात्र है, जिसका कोई टिकाव नहीं। अगर इसके पहले यह निश्चय तो कर लेना ही था कि वह पत्थर साहचर्य के खराद पर चढ़ेगा, उसमें खरादे जाने की क्षमता है भी या नहीं। सभी पत्थर तो खराद पर चढ़कर सुंदर मूर्तियाँ नहीं बन जाते।
(UPSC 1989, 20 Marks, )