तू जो बात नहीं समझती, उसमें टांग क्‍यों अड़ाती है भाई! मेरी लाठी दे दे और अपना काम देख। यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है, नहीं कहीं पता न लगता किधर गये। गांव में इतने आदमी तो हैं, किस पर बेदखली नहीं आयी, किस पर कुड़की नहीं आयी। जब दूसरे के पाँवों तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पांवों को सहलाने में ही कुशल है।। (UPSC 2004, 20 Marks, )

Enroll Now