जीवन के संघर्ष में उसे सदैव हार हुई, पर उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। प्रत्येक हार जैसे उसे भाग्य से लड्ने की शक्ति दे देती थी; मगर अब वह उस अन्तिम दशा को पहुँच गया था, जब उसमें आत्मविश्वास भी न रहा था। अगर वह अपने धर्म पर अटल रह सकता, तो भी कुछ आंसू पुँछते; मगर वह बात न थी। उसने नीयत भी बिगाड़ी, अधर्म भी कमाया, कोई ऐसी बुराई न थी जिसमें वह पड़ा न हो; पर जीवन की कोई अभिलाषा न पूरी हुई, और भले दिन मृगतृष्णा को भाँति दूर ही होते चले गये। यहाँ तक कि आब उसे धोखा भी न रह गया था। झूठी आशा को हरियाली और चमक भी अब नज़र न आती थी। हारे हुए महीप की भाँति उसने अपने को तीन बीघे के किले में बन्द कर लिया. था और उसे प्राणों की तरह बचा रहा था।। (UPSC 2005, 20 Marks, )

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