बात यह है कि लोभ का प्रथम अवयव सुखात्मक होने के कारण लोभी विषय की ओर बराबर प्रवृत्त रहता है। धन का लोभी धन पाकर लोभ से निवृत्त नहीं हो जाता; या तो भले-बुरे का सब विचार छोड़ उसकी रक्षा में तत्पर दिखाई देता है या और अधिक प्राप्ति में। इस प्रकार लोभ से अन्य मुख्य वृत्तियों का जो स्तम्भन होता है, वह स्वभावान्तरगत हो जाता है। (UPSC 1980, 20 Marks, )

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