"रूप को भावना का बहुत कुछ सम्बन्ध व्यक्तिगत रुचि से होता है। अतः किसी के रूप और हमारे बीच यदि तीसरा व्यक्ति आया तो इस व्यापार में सामाजिकता आ गई; क्योंकि हमें उस समय यह ध्यान हुआ कि उस रूप से एक तीसरे व्यक्ति को आनन्द या सुख मिला और हमें भी मिल सकता है। जब तक हम किसी के रूप का बखान सुनकर 'वाह-वाह' करते जायेंगे तब तक हम एक प्रकार के लोभी अथवा रीझने वाले या कद्रदान ही कहलाएंगे, पर जब हम उसके दर्शन के लिए आकुल होंगे, उसे बराबर अपने पास रखना चाहेंगे; तब प्रेम का सूत्रपात समझा जाएगा।"
(UPSC 2009, 20 Marks, )
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"रूप को भावना का बहुत कुछ सम्बन्ध व्यक्तिगत रुचि से होता है। अतः किसी के रूप और हमारे बीच यदि तीसरा व्यक्ति आया तो इस व्यापार में सामाजिकता आ गई; क्योंकि हमें उस समय यह ध्यान हुआ कि उस रूप से एक तीसरे व्यक्ति को आनन्द या सुख मिला और हमें भी मिल सकता है। जब तक हम किसी के रूप का बखान सुनकर 'वाह-वाह' करते जायेंगे तब तक हम एक प्रकार के लोभी अथवा रीझने वाले या कद्रदान ही कहलाएंगे, पर जब हम उसके दर्शन के लिए आकुल होंगे, उसे बराबर अपने पास रखना चाहेंगे; तब प्रेम का सूत्रपात समझा जाएगा।"
(UPSC 2009, 20 Marks, )