दक्खिनी हिन्दी के स्वरूप का परिचय दीजिए।
(UPSC 2014, 15 Marks, )
Theme:
दक्खिनी हिन्दी का संक्षिप्त परिचय
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Linguistics.")
दक्खिनी हिन्दी के स्वरूप का परिचय दीजिए।
दक्खिनी हिन्दी के स्वरूप का परिचय दीजिए।
(UPSC 2014, 15 Marks, )
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दक्खिनी हिन्दी का संक्षिप्त परिचय
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(The subject of the above question is "Linguistics.")
दक्खिनी हिन्दी के स्वरूप का परिचय दीजिए।
Introduction
दक्खिनी हिन्दी, जिसे दक्खिनी उर्दू भी कहा जाता है, दक्षिण भारत में विकसित एक भाषा रूप है। यह 14वीं शताब्दी में बहमनी सल्तनत के दौरान उभरी। अमीर खुसरो और विलियम ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने इसके विकास में योगदान दिया। यह भाषा फारसी, अरबी, और स्थानीय भाषाओं के मिश्रण से बनी है। दक्खिनी हिन्दी का साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व है, जो इसे एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।
दक्खिनी हिन्दी का संक्षिप्त परिचय
● दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप:
● दक्खिनी हिन्दी उत्तर भारत में प्रचलित कौरवी बोली का ही रूपांतरित स्वरूप है।
○ इस पर फारसी का प्रभाव अत्यधिक है।
○ यह बोली भारत के दक्षिण में स्थित हैदराबाद, देवगिरी तथा गुलवर्गा के क्षेत्रों में बोली जाती है।
○ इसका विकास सल्तनत काल में दक्षिण अभियान, मुहम्मद बिन तुगलक का देवगिरी में राजधानी परिवर्तन आदि के निर्णयों के फलस्वरूप हुई।
● ध्वनि संबंधी विशेषताएं:
○ खड़ी बोली के सभी स्वर तथा व्यंजन दक्खिनी हिन्दी में मिलते हैं।
○ फारसी प्रभाव के कारण ग, फ, ज जैसे वर्णों की अधिकता है।
● महाप्राण ध्वनियों को अल्पप्राणीकरण करने की प्रवृत्ति पाई जाती है, जैसे- समझ को समज, कुछ को कुच।
○ कहीं-कहीं अल्पप्राण ध्वनियों को महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति भी पाई जाती है, जैसे पहचान का पछान।
● 'न्द' तथा 'न्ध' को न करने की प्रवृत्ति मिलती है, जैसे चान्दनी को चाननी।
● व्याकरणिक विशेषताएं:
○ पुल्लिंग बहुवचन एकारांत होते हैं, जैसे बिछुड़े, मिले।
○ स्त्रीवाची एकवचन इकरांत होते हैं, जैसे खुदी, खुशी।
○ सर्वनामों में मुज, मेरा, तू, तुज, तेरा, वो, उनन का प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
○ परसर्गों में कर्ता - 0, ने, नै; कर्म - कू, कूं, को; करण - सों, सेती, ते, तें; सप्रदान - तई, वास्ते; अपादान - ते, तें, सूँ; संबंध - का, के, केर; अधिकरण - पे, मैं, में, मांझ; संबोधन - अरे, ए, भई।
○ किया रूप में वर्तमानकाल के लिए है, हैं, अहे; भूतकाल के लिए था, थी; भविष्यकाल के लिए होगा, होगी, चलसीं, चलसूं का प्रयोग होता है।
● शब्दावली संबंधी विशेषताएं:
○ शब्द भण्डार की दृष्टि से दक्खिनी हिन्दी तद्भव प्रधान है।
○ यह तद्भवता संस्कृत के अतिरिक्त अरबी, फारसी के तत्सम शब्दों के भी विकसित रूपों पर आधारित है, जैसे ईश का ईस, शेषज्ञ का सेस।
○ मराठी, तेलगू, कन्नड़ में स्थानीय शब्द भी इसमें पाए जाते हैं।
● दक्खिनी हिन्दी उत्तर भारत में प्रचलित कौरवी बोली का ही रूपांतरित स्वरूप है।
○ इस पर फारसी का प्रभाव अत्यधिक है।
○ यह बोली भारत के दक्षिण में स्थित हैदराबाद, देवगिरी तथा गुलवर्गा के क्षेत्रों में बोली जाती है।
○ इसका विकास सल्तनत काल में दक्षिण अभियान, मुहम्मद बिन तुगलक का देवगिरी में राजधानी परिवर्तन आदि के निर्णयों के फलस्वरूप हुई।
● ध्वनि संबंधी विशेषताएं:
○ खड़ी बोली के सभी स्वर तथा व्यंजन दक्खिनी हिन्दी में मिलते हैं।
○ फारसी प्रभाव के कारण ग, फ, ज जैसे वर्णों की अधिकता है।
● महाप्राण ध्वनियों को अल्पप्राणीकरण करने की प्रवृत्ति पाई जाती है, जैसे- समझ को समज, कुछ को कुच।
○ कहीं-कहीं अल्पप्राण ध्वनियों को महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति भी पाई जाती है, जैसे पहचान का पछान।
● 'न्द' तथा 'न्ध' को न करने की प्रवृत्ति मिलती है, जैसे चान्दनी को चाननी।
● व्याकरणिक विशेषताएं:
○ पुल्लिंग बहुवचन एकारांत होते हैं, जैसे बिछुड़े, मिले।
○ स्त्रीवाची एकवचन इकरांत होते हैं, जैसे खुदी, खुशी।
○ सर्वनामों में मुज, मेरा, तू, तुज, तेरा, वो, उनन का प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
○ परसर्गों में कर्ता - 0, ने, नै; कर्म - कू, कूं, को; करण - सों, सेती, ते, तें; सप्रदान - तई, वास्ते; अपादान - ते, तें, सूँ; संबंध - का, के, केर; अधिकरण - पे, मैं, में, मांझ; संबोधन - अरे, ए, भई।
○ किया रूप में वर्तमानकाल के लिए है, हैं, अहे; भूतकाल के लिए था, थी; भविष्यकाल के लिए होगा, होगी, चलसीं, चलसूं का प्रयोग होता है।
● शब्दावली संबंधी विशेषताएं:
○ शब्द भण्डार की दृष्टि से दक्खिनी हिन्दी तद्भव प्रधान है।
○ यह तद्भवता संस्कृत के अतिरिक्त अरबी, फारसी के तत्सम शब्दों के भी विकसित रूपों पर आधारित है, जैसे ईश का ईस, शेषज्ञ का सेस।
○ मराठी, तेलगू, कन्नड़ में स्थानीय शब्द भी इसमें पाए जाते हैं।
Conclusion
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप दक्षिण भारत में विकसित हुआ, जो उर्दू और हिन्दी का मिश्रण है। यह भाषा गोलकुंडा, बीजापुर और गोलकुंडा के दरबारों में पनपी। अमीर खुसरो ने इसे "हिन्दवी" कहा। गुलबर्गा और बीदर में इसका साहित्यिक विकास हुआ। शाह मीरांजी और वली दक्खिनी इसके प्रमुख कवि हैं। आज, यह भाषा सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित है। भविष्य में, इसे साहित्यिक और शैक्षिक मंचों पर बढ़ावा देना आवश्यक है।