दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
(UPSC 2015, 15 Marks, )
Theme:
दक्खिनी हिन्दी की विशेषताएँ
Where in Syllabus:
(Modern Hindi Dialects.)
दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
(UPSC 2015, 15 Marks, )
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दक्खिनी हिन्दी की विशेषताएँ
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(Modern Hindi Dialects.)
दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Introduction
दक्खिनी हिन्दी का उद्भव 14वीं शताब्दी में हुआ और यह दक्षिण भारत में विकसित हुई। इसे अमीर खुसरो ने अपनी रचनाओं में स्थान दिया। गुलबर्गा और बीजापुर इसके प्रमुख केंद्र थे। इस भाषा में फारसी और अरबी का प्रभाव स्पष्ट है। रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिन्दी का एक महत्वपूर्ण रूप माना। दक्खिनी हिन्दी की विशेषता इसकी सरलता और लोकभाषा के निकटता है, जो इसे जनसाधारण के बीच लोकप्रिय बनाती है।
दक्खिनी हिन्दी की विशेषताएँ
● खड़ी बोली का स्वरूप:
● दक्खिनी हिन्दी में 19वीं शताब्दी से पहले की खड़ी बोली का सबसे अधिक और व्यावहारिक स्वरूप विद्यमान है। यह भाषा का एक प्राचीन और समृद्ध रूप है।
● पद्य और गद्य का विकास:
○ दक्खिनी हिन्दी में खड़ी बोली पद्य के साथ-साथ गद्य की विकास-प्रक्रिया भी पर्याप्त विकसित दिखाई देती है। यह साहित्यिक विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
● भाषिक प्रवृत्तियाँ और व्याकरणिक विशेषताएँ:
● आकारांतता: जैसे उजाला, दिया, लिया, पिलाना आदि।
● पुल्लिंग बहुवचन: एकारांत है जैसे बिछुड़े मिले, दरवाजे आदि।
● स्त्रीवाची एकवचन: ईकरांत है जैसे खुदी, खुशी, तेरी, मेरी आदि।
● सर्वनाम: जैसे मैं, मुझ, मुझे; तूं, तेरा, तुझ आदि।
● शब्द भंडार:
○ दक्खिनी हिन्दी तद्भव-प्रधान है। यह संस्कृत के अतिरिक्त अरबी-फारसी के तत्सम शब्दों के भी विकसित रूपों पर आधारित है, जैसे ईश-ईस, शेष-सेस, सूर्य-सूरज आदि।
○ समकालीन बोलचाल में प्रचलित अरबी-फारसी शब्दों का भी बहुतायत से प्रयोग मिलता है जैसे आशिक, पीर, परहेज, इंसान, दरबान, नूर आदि।
● साहित्यिक योगदान:
○ दक्खिनी हिन्दी के सभी रचनाकार मुस्लिम कवि हैं और उनमें से भी अधिकांश सूफी। इनके साहित्य में भारतीय अद्वैतवाद की झलक होने के कारण जन सामान्य का इनसे तादात्म्य सहज स्वाभाविक था।
○ प्रमुख कवि हैं: ख्वाजा बंदे नवाज, निजामी, शाह अली मुहम्मद, कुली कुतुबशाह, नुसरती, वली आदि।
● उदाहरण:
"जिसे इश्क का तीर कारी लगे, उसे जिंदगी क्यों न भारी लगे।"
○ "वली को कहे तूं अगर एकवचन, रकीबों के दिल में कटारी लगे।"
● दक्खिनी हिन्दी में 19वीं शताब्दी से पहले की खड़ी बोली का सबसे अधिक और व्यावहारिक स्वरूप विद्यमान है। यह भाषा का एक प्राचीन और समृद्ध रूप है।
● पद्य और गद्य का विकास:
○ दक्खिनी हिन्दी में खड़ी बोली पद्य के साथ-साथ गद्य की विकास-प्रक्रिया भी पर्याप्त विकसित दिखाई देती है। यह साहित्यिक विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
● भाषिक प्रवृत्तियाँ और व्याकरणिक विशेषताएँ:
● आकारांतता: जैसे उजाला, दिया, लिया, पिलाना आदि।
● पुल्लिंग बहुवचन: एकारांत है जैसे बिछुड़े मिले, दरवाजे आदि।
● स्त्रीवाची एकवचन: ईकरांत है जैसे खुदी, खुशी, तेरी, मेरी आदि।
● सर्वनाम: जैसे मैं, मुझ, मुझे; तूं, तेरा, तुझ आदि।
● शब्द भंडार:
○ दक्खिनी हिन्दी तद्भव-प्रधान है। यह संस्कृत के अतिरिक्त अरबी-फारसी के तत्सम शब्दों के भी विकसित रूपों पर आधारित है, जैसे ईश-ईस, शेष-सेस, सूर्य-सूरज आदि।
○ समकालीन बोलचाल में प्रचलित अरबी-फारसी शब्दों का भी बहुतायत से प्रयोग मिलता है जैसे आशिक, पीर, परहेज, इंसान, दरबान, नूर आदि।
● साहित्यिक योगदान:
○ दक्खिनी हिन्दी के सभी रचनाकार मुस्लिम कवि हैं और उनमें से भी अधिकांश सूफी। इनके साहित्य में भारतीय अद्वैतवाद की झलक होने के कारण जन सामान्य का इनसे तादात्म्य सहज स्वाभाविक था।
○ प्रमुख कवि हैं: ख्वाजा बंदे नवाज, निजामी, शाह अली मुहम्मद, कुली कुतुबशाह, नुसरती, वली आदि।
● उदाहरण:
"जिसे इश्क का तीर कारी लगे, उसे जिंदगी क्यों न भारी लगे।"
○ "वली को कहे तूं अगर एकवचन, रकीबों के दिल में कटारी लगे।"
Conclusion
दक्खिनी हिन्दी की विशेषताएँ इसकी सरलता, स्थानीय बोलियों का समावेश और सांस्कृतिक विविधता में निहित हैं। यह भाषा दक्षिण भारत में विकसित हुई और इसमें उर्दू और मराठी का प्रभाव देखा जाता है। अमीर खुसरो और वली दक्खिनी जैसे कवियों ने इसे समृद्ध किया। आगे बढ़ने के लिए, दक्खिनी हिन्दी के साहित्य को संरक्षित और प्रोत्साहित करना आवश्यक है ताकि यह भाषा अपनी अनूठी पहचान बनाए रख सके और नई पीढ़ियों तक पहुंचे।