दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
(UPSC 2019, 10 Marks, )
Theme:
दक्खिनी हिन्दी का ऐतिहासिक स्वरूप
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Linguistics.")
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
(UPSC 2019, 10 Marks, )
Theme:
दक्खिनी हिन्दी का ऐतिहासिक स्वरूप
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Linguistics.")
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
Introduction
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप दक्षिण भारत में विकसित हुआ और इसे दक्खिनी उर्दू भी कहा जाता है। यह भाषा 14वीं शताब्दी में बहमनी सल्तनत के दौरान उभरी। गुलबर्गा और बीदर इसके प्रमुख केंद्र थे। अमीर खुसरो और वली दक्खिनी जैसे कवियों ने इसे समृद्ध किया। यह भाषा फारसी, अरबी, और स्थानीय बोलियों का मिश्रण है, जो इसे अद्वितीय बनाता है। शम्सुर रहमान फारूकी ने इसे उर्दू साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।
दक्खिनी हिन्दी का ऐतिहासिक स्वरूप
● दक्खिनी हिन्दी का विकास
● 14वीं से 18वीं शताब्दी के बीच बहमनी, कुतुबशाही, और आदिलशाही जैसे राज्यों में इसका विकास हुआ।
○ यह दिल्ली-हरियाणा की बोली का दक्षिण में ले जाया गया स्वरूप है।
● भाषिक विशेषताएं
● खड़ी बोली का ठेठ और व्यावहारिक स्वरूप 19वीं शताब्दी से पहले दक्खिनी हिन्दी में विद्यमान था।
● गद्य की विकास-प्रक्रिया में खड़ी बोली के साथ-साथ पर्याप्त विकास दिखायी देता है।
● सूफी कवियों का योगदान, जिनके साहित्य में भारतीय अद्वैतवाद की झलक मिलती है।
● भाषा का स्वरूप
● आकारांतता: जैसे उजाला, दिया, लिया, पिलाना, हुआ, देख्या।
● पुल्लिंग बहुवचन: जैसे बिछुड़े, मिले, दरवाजे; स्त्रीवाची एकवचन: जैसे खुदी, खुशी, तेरी, मेरी।
● सर्वनाम: जैसे मैं, मुझ, मुझे; तू, तेरा, तुझ; वो। निजवाचक सर्वनाम: अपन, अपना, अपनी, अपने।
● कारकीय परसों: जैसे ने, को, कों, कूं, सों, का-के-की।
● शब्दभंडार
● तद्भव प्रधानता: खड़ी बोली की पुष्ट आधारशिला।
● संस्कृत के अतिरिक्त अरबी-फारसी के तत्सम शब्दों के विकसित रूप: जैसे ईश > ईस, शेष > सेस, सूर्य > सूरज।
● अरबी-फारसी शब्दों का प्रयोग: जैसे आशिक, पीर, परहेज, इंसान, दरबान, नूर।
● सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
● जन-सामान्य के साथ सहज तादात्म्य।
● समकालीन जन-समुदाय में बोलचाल और आम व्यवहार की भाषा के रूप में खड़ी बोली का प्रारंभिक स्वरूप।
● 14वीं से 18वीं शताब्दी के बीच बहमनी, कुतुबशाही, और आदिलशाही जैसे राज्यों में इसका विकास हुआ।
○ यह दिल्ली-हरियाणा की बोली का दक्षिण में ले जाया गया स्वरूप है।
● भाषिक विशेषताएं
● खड़ी बोली का ठेठ और व्यावहारिक स्वरूप 19वीं शताब्दी से पहले दक्खिनी हिन्दी में विद्यमान था।
● गद्य की विकास-प्रक्रिया में खड़ी बोली के साथ-साथ पर्याप्त विकास दिखायी देता है।
● सूफी कवियों का योगदान, जिनके साहित्य में भारतीय अद्वैतवाद की झलक मिलती है।
● भाषा का स्वरूप
● आकारांतता: जैसे उजाला, दिया, लिया, पिलाना, हुआ, देख्या।
● पुल्लिंग बहुवचन: जैसे बिछुड़े, मिले, दरवाजे; स्त्रीवाची एकवचन: जैसे खुदी, खुशी, तेरी, मेरी।
● सर्वनाम: जैसे मैं, मुझ, मुझे; तू, तेरा, तुझ; वो। निजवाचक सर्वनाम: अपन, अपना, अपनी, अपने।
● कारकीय परसों: जैसे ने, को, कों, कूं, सों, का-के-की।
● शब्दभंडार
● तद्भव प्रधानता: खड़ी बोली की पुष्ट आधारशिला।
● संस्कृत के अतिरिक्त अरबी-फारसी के तत्सम शब्दों के विकसित रूप: जैसे ईश > ईस, शेष > सेस, सूर्य > सूरज।
● अरबी-फारसी शब्दों का प्रयोग: जैसे आशिक, पीर, परहेज, इंसान, दरबान, नूर।
● सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
● जन-सामान्य के साथ सहज तादात्म्य।
● समकालीन जन-समुदाय में बोलचाल और आम व्यवहार की भाषा के रूप में खड़ी बोली का प्रारंभिक स्वरूप।
Conclusion
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप दक्षिण भारत में विकसित हुआ, जो उर्दू और हिन्दी का मिश्रण है। यह भाषा गोलकुंडा और बीजापुर के दरबारों में फली-फूली। अमीर खुसरो ने इसे "हिन्दवी" कहा। शिवाजी सावंत के अनुसार, यह भाषा सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक है। आज, इसे संरक्षित करने के लिए शैक्षणिक और सांस्कृतिक प्रयास आवश्यक हैं। भाषाविद् इसे भारतीय भाषाई विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। भविष्य में, इसे डिजिटल माध्यमों में बढ़ावा देना चाहिए।