दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
(UPSC 2021, 10 Marks, )
Theme:
दक्खिनी हिन्दी का ऐतिहासिक स्वरूप
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Linguistics.")
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
(UPSC 2021, 10 Marks, )
Theme:
दक्खिनी हिन्दी का ऐतिहासिक स्वरूप
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Linguistics.")
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
Introduction
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप दक्षिण भारत में विकसित हुआ और इसे दक्खिनी उर्दू भी कहा जाता है। यह भाषा 14वीं शताब्दी में बहमनी सल्तनत के दौरान उभरी। गुलबर्गा और बीदर इसके प्रमुख केंद्र थे। अमीर खुसरो और वली दक्खिनी जैसे कवियों ने इसे समृद्ध किया। यह भाषा फारसी, अरबी, और स्थानीय बोलियों का मिश्रण है, जो इसे अद्वितीय बनाता है। शम्सुर रहमान फारूकी ने इसे उर्दू साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।
दक्खिनी हिन्दी का ऐतिहासिक स्वरूप
● दक्खिनी हिंदी का उद्भव:
● खड़ी बोली से उत्पन्न हुई।
● सूफी संतों का योगदान महत्वपूर्ण।
● दिल्ली सल्तनत के शासकों के अभियानों का प्रभाव।
● भाषाई तत्व:
○ उत्तर और दक्षिण भारत के भाषाई तत्वों का समावेश।
● क्षेत्रीय विस्तार: हैदराबाद, विजयवाड़ा, अमरावती से लेकर अरब सागर तक।
● स्वरूप संबंधी विवाद:
○ हिंदी भाषी इसे हिंदी और उर्दू भाषी इसे उर्दू मानते हैं।
● दक्खिनी का विकास उर्दू के जन्म से पहले।
● भाषिक स्वरूप:
○ मूलतः हरियाणवी और खड़ी बोली।
● सूफियों के साथ दक्षिण में पहुंची।
○ मिठास और प्रवाह से युक्त।
● व्याकरणिक स्वरूप:
● फारसी लिपि में लिखित।
● कौरवी हरियाणवी का व्याकरणिक स्वरूप।
● ध्वनिगत स्वरूप:
● महाप्राण ध्वनियों का अल्पीकरण।
○ 'ड़' के स्थान पर 'ड' का प्रयोग।
● ध्वनि के विपर्यय की प्रवृत्ति।
● कारक व्यवस्था:
○ कर्ता: ने, नै
○ कर्म: कू, कॅ
○ करण: सौ, सेती
● सर्वनाम व्यवस्था:
○ उत्तम पुरुष: मेरेकू, हमन
○ मध्यम पुरुष: तुम, तुमे
● क्रिया स्वरूप:
○ वर्तमान काल: अरै, हे
○ भूतकाल: कंटवा, बेल्वा
● विशेषण:
○ संख्या वाचक में उन्नीस का प्रयोग।
○ विशेषण, विशेष्य के अनुसार विकारी।
● दक्खिनी साहित्य:
● प्राथमिक हिंदी साहित्य माना जाता है।
○ हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी, पंजाबी, ब्रज, गुजराती का समावेश।
○ हिंदी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण स्थान।
● खड़ी बोली से उत्पन्न हुई।
● सूफी संतों का योगदान महत्वपूर्ण।
● दिल्ली सल्तनत के शासकों के अभियानों का प्रभाव।
● भाषाई तत्व:
○ उत्तर और दक्षिण भारत के भाषाई तत्वों का समावेश।
● क्षेत्रीय विस्तार: हैदराबाद, विजयवाड़ा, अमरावती से लेकर अरब सागर तक।
● स्वरूप संबंधी विवाद:
○ हिंदी भाषी इसे हिंदी और उर्दू भाषी इसे उर्दू मानते हैं।
● दक्खिनी का विकास उर्दू के जन्म से पहले।
● भाषिक स्वरूप:
○ मूलतः हरियाणवी और खड़ी बोली।
● सूफियों के साथ दक्षिण में पहुंची।
○ मिठास और प्रवाह से युक्त।
● व्याकरणिक स्वरूप:
● फारसी लिपि में लिखित।
● कौरवी हरियाणवी का व्याकरणिक स्वरूप।
● ध्वनिगत स्वरूप:
● महाप्राण ध्वनियों का अल्पीकरण।
○ 'ड़' के स्थान पर 'ड' का प्रयोग।
● ध्वनि के विपर्यय की प्रवृत्ति।
● कारक व्यवस्था:
○ कर्ता: ने, नै
○ कर्म: कू, कॅ
○ करण: सौ, सेती
● सर्वनाम व्यवस्था:
○ उत्तम पुरुष: मेरेकू, हमन
○ मध्यम पुरुष: तुम, तुमे
● क्रिया स्वरूप:
○ वर्तमान काल: अरै, हे
○ भूतकाल: कंटवा, बेल्वा
● विशेषण:
○ संख्या वाचक में उन्नीस का प्रयोग।
○ विशेषण, विशेष्य के अनुसार विकारी।
● दक्खिनी साहित्य:
● प्राथमिक हिंदी साहित्य माना जाता है।
○ हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी, पंजाबी, ब्रज, गुजराती का समावेश।
○ हिंदी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण स्थान।
Conclusion
दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप दक्षिण भारत में विकसित हुआ, जो उर्दू और हिन्दी का मिश्रण है। यह भाषा गोलकुंडा और बीजापुर के दरबारों में फली-फूली। अमीर खुसरो ने इसे "हिन्दवी" कहा। शिवाजी सावंत के अनुसार, यह भाषा सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक है। आज, इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है, ताकि इसकी समृद्ध विरासत और साहित्यिक योगदान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सके। भविष्य में, इसे डिजिटल माध्यमों द्वारा प्रचारित किया जा सकता है।