संत-साहित्य की विशेषताएँ।
(UPSC 2015, 10 Marks, )
Theme:
संत-साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
संत-साहित्य की विशेषताएँ।
संत-साहित्य की विशेषताएँ।
(UPSC 2015, 10 Marks, )
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संत-साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ
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(Hindi Literature)
संत-साहित्य की विशेषताएँ।
Introduction
संत-साहित्य भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण धारा है, जो भक्ति आंदोलन के दौरान विकसित हुई। इस साहित्य में कबीर, रैदास, और तुलसीदास जैसे संतों के विचार शामिल हैं। संत-साहित्य की विशेषता इसकी सरल भाषा, सामाजिक समरसता, और आध्यात्मिकता है। यह साहित्य मानवता, प्रेम, और ईश्वर के प्रति भक्ति को प्रोत्साहित करता है। संतों ने अपने काव्य के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधविश्वास और जातिवाद का विरोध किया।
संत-साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ
● सामाजिक और आर्थिक असमानता का विरोध: संत कवि मुख्यतः निम्न वर्ग और निम्न वर्ण से थे। उनकी रचनाओं में आर्थिक और सामाजिक असमानता के विरुद्ध संघर्ष की भावना प्रकट होती है। उदाहरण के लिए, कबीर और रैदास जैसे संतों ने इस असमानता के खिलाफ आवाज उठाई।
● अनुभूति की प्रामाणिकता: संत साहित्य में देखे, जाने और परखे हुए अनुभवों को ही काव्य विषय बनाया गया है। यह पुस्तकीय ज्ञान के बजाय आखिन देखी पर आधारित है।
● रूढ़ियों और आडंबरों का विरोध: संतों ने बाह्याचारों और आडंबरों का विरोध किया और अन्तसांधना का समर्थन किया। उदाहरण के लिए, कबीर का दोहा:
● "पाहन पूजे हरि मिलै तो मैं पूजू पहाड़, तातें यह चाकी भली पीस खाय संसार।"
● गुरू की महिमा: संत काव्य में गुरू को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। गुरू को ईश्वर-प्राप्ति का मार्गदर्शक माना गया है। उदाहरण:
● "गुरू गोबिंद दोउ खड़े काके लागू पांय, बलिहारी गुरू आपनो गोबिंद दियो बताय।"
● रहस्यवाद की अभिव्यक्ति: संतों ने भारतीय अद्वैतवाद और सूफी दर्शन के मिश्रण से रहस्यवाद की सृष्टि की। इसमें आत्मा और परमात्मा का एकाकार होना प्रमुख है।
● प्रेम पर बल: संत ज्ञानमार्गी होते हुए भी उनके काव्य में प्रेम पर अधिक बल दिया गया है।
● "ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय"
● निर्गुण ब्रह्म: संतों का ब्रह्म निर्गुण ब्रह्म है, जो निराकार और निरूपाधि है। वे अवतारवाद का विरोध करते हैं।
● छंद एवं भाषा: संतों की भाषा जन भाषा थी, जिसमें आमजन में प्रचलित शब्दावलियों का प्रयोग होता था। यह भाषा प्रतीक और बिंब का भी वहन करती है। उदाहरण:
● "प्रभुजी तुम चंदन हम पानी, जाकि अंग-अंग बास समानी।"
इन विशेषताओं के माध्यम से संत साहित्य ने समाज में गहरी छाप छोड़ी और सामाजिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
● अनुभूति की प्रामाणिकता: संत साहित्य में देखे, जाने और परखे हुए अनुभवों को ही काव्य विषय बनाया गया है। यह पुस्तकीय ज्ञान के बजाय आखिन देखी पर आधारित है।
● रूढ़ियों और आडंबरों का विरोध: संतों ने बाह्याचारों और आडंबरों का विरोध किया और अन्तसांधना का समर्थन किया। उदाहरण के लिए, कबीर का दोहा:
● "पाहन पूजे हरि मिलै तो मैं पूजू पहाड़, तातें यह चाकी भली पीस खाय संसार।"
● गुरू की महिमा: संत काव्य में गुरू को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। गुरू को ईश्वर-प्राप्ति का मार्गदर्शक माना गया है। उदाहरण:
● "गुरू गोबिंद दोउ खड़े काके लागू पांय, बलिहारी गुरू आपनो गोबिंद दियो बताय।"
● रहस्यवाद की अभिव्यक्ति: संतों ने भारतीय अद्वैतवाद और सूफी दर्शन के मिश्रण से रहस्यवाद की सृष्टि की। इसमें आत्मा और परमात्मा का एकाकार होना प्रमुख है।
● प्रेम पर बल: संत ज्ञानमार्गी होते हुए भी उनके काव्य में प्रेम पर अधिक बल दिया गया है।
● "ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय"
● निर्गुण ब्रह्म: संतों का ब्रह्म निर्गुण ब्रह्म है, जो निराकार और निरूपाधि है। वे अवतारवाद का विरोध करते हैं।
● छंद एवं भाषा: संतों की भाषा जन भाषा थी, जिसमें आमजन में प्रचलित शब्दावलियों का प्रयोग होता था। यह भाषा प्रतीक और बिंब का भी वहन करती है। उदाहरण:
● "प्रभुजी तुम चंदन हम पानी, जाकि अंग-अंग बास समानी।"
इन विशेषताओं के माध्यम से संत साहित्य ने समाज में गहरी छाप छोड़ी और सामाजिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
Conclusion
संत-साहित्य की विशेषताएँ भक्ति, सरलता, और सामाजिक सुधार पर केंद्रित हैं। कबीर, रैदास, और तुलसीदास जैसे संतों ने इसे समृद्ध किया। यह साहित्य जाति-पाति और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाता है। कबीर के दोहे "पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय" ज्ञान की सार्थकता पर जोर देते हैं। भविष्य में, संत-साहित्य की शिक्षाओं को आधुनिक संदर्भ में लागू कर सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सकता है।