रहीम की काव्य-भाषा का महत्त्व। (UPSC 2021, 10 Marks, )

Theme: रहीम की काव्य-भाषा का सांस्कृतिक प्रभाव Where in Syllabus: (The subject of the above question is Hindi Literature.)
रहीम की काव्य-भाषा का महत्त्व।

Introduction

रहीम की काव्य-भाषा का महत्त्व उनके समय की सामाजिक और सांस्कृतिक धारा को प्रतिबिंबित करता है। उनकी भाषा में फारसी, अरबी, और संस्कृत का समावेश है, जो उनकी बहुभाषी विद्वता को दर्शाता है। रामचंद्र शुक्ल ने रहीम की भाषा को सरल और प्रभावी बताया है, जो जनसाधारण तक आसानी से पहुँचती है। रहीम की काव्य-भाषा ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया और उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं।

रहीम की काव्य-भाषा का सांस्कृतिक प्रभाव

 ● भाषिक सम्प्रेषण: रहीम की भाषा में सम्प्रेषण की पूरी अर्थवेत्ता मौजूद है, जो उनकी रचनाओं को प्रभावी बनाती है। रामचंद्र शुक्ल ने रहीम को तुलसी के करीब माना है, जो उनकी भाषा की उत्कृष्टता को दर्शाता है।  
  ● भाषा का मिश्रण: रहीम की भाषा में खड़ी बोली, अवधी, ब्रज के साथ-साथ अरबी, फारसी, और तुर्की शब्दों का प्रयोग हुआ है। यह मिश्रण उनकी भाषा को विविधता और गहराई प्रदान करता है।  
  ● सूक्तिकाव्य का रूप: रहीम की भाषा में सूक्तिकाव्य का रूप मिलता है, जो मानव जीवन के पर्यवेक्षण में सहायता देती है और जीवन के विविध संदर्भों को समाहित करती है।  
  ● सरलता और सहजता: रहीम की भाषा की विशेषता यह है कि वह कथ्य को सरल, सहज और नपे-तुले छोटे-छोटे शब्दों में समेट लेती है। उदाहरण: "खैर, खून, खांसी, खुसी, बैर, प्रीति मदपान।"  
  ● भाषा का संवर्द्धन: रहीम ने अवधी में बरवै रामायण, खड़ी बोली में मदनावटक, और संस्कृत मिश्रित हिंदी में 'खेत कौतुक जातकम' की रचना कर भाषाओं का संवर्द्धन किया।  
  ● तत्सम, तद्धभव और देशज शब्दों का प्रयोग: रहीम की भाषा में तत्सम, तद्धभव और देशज शब्दों का प्रयोग जन सामान्य भाषा के स्वरूप में ढल जाता है। उदाहरण: "जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग।"  
  ● गंगा-जमुना संस्कृति: रहीम की भाषा में अरबी, फारसी, तुर्की शब्दों के साथ देशज और विदेशज का मिश्रण गंगा-जमुना संस्कृति को बढ़ावा देता है। उदाहरण: "फरजी साह न हुई सके, गति टेढ़ी तासीर।"  
  ● लोकरंग की झलक: रहीम की भाषा में लोकरंग की अद्भुत झलक है, जो अवधी, ब्रजभाषा, संस्कृत, फारसी, राजस्थानी डिंगल और ठेठ ग्रामीण लोक शब्दावली के प्रयोग से सर्वसाधारण की भाषा बन जाती है।  
  ● लोकप्रचलित लोकोक्तियाँ और मुहावरे: रहीम लोकप्रचलित लोकोक्तियों और मुहावरों से भाषा को आत्मीय कलेवर प्रदान करते हैं। उदाहरण: "रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।"  
  ● अनुभव का अंग: रहीम की भाषा माध्यम भर न होकर अनुभव का अंग बन गई है, जो उनकी रचना को काव्य की चेतना में समाविष्ट करती है। उदाहरण: "एकहि साधे सब सधै सब साथै सब जाय।"  
  ● प्रासंगिकता: रहीम के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं और समाज को प्रेम और समरसता का संदेश आसानी से सम्प्रेषित करते हैं। उदाहरण: "रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।"  
  ● विद्यानिवास मिश्र के अनुसार: रहीम ने आत्मीयता की राह खोजी है और अपनी विदग्धता को सहजता से जोड़ते हैं। वे फारसी के अंदाज को गांव के सलोनेपन के साथ जोड़ते हैं।  

Conclusion

रहीम की काव्य-भाषा का महत्त्व उनकी सरलता और गहनता में निहित है। उनकी रचनाएँ भक्ति और नीति के अद्वितीय संगम को प्रस्तुत करती हैं। रहीम की भाषा में उर्दू, फारसी और संस्कृत का समावेश है, जो उनकी कविताओं को व्यापकता प्रदान करता है। रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि रहीम की भाषा में जनसाधारण की समझ और गहराई है। भविष्य में, उनकी भाषा का अध्ययन साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा दे सकता है।