प्रारम्भिक खड़ीबोली और खुसरो की कविता।
(UPSC 2015, 10 Marks, )
Theme:
खड़ीबोली और खुसरो की काव्य धारा
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Literature.")
प्रारम्भिक खड़ीबोली और खुसरो की कविता।
प्रारम्भिक खड़ीबोली और खुसरो की कविता।
(UPSC 2015, 10 Marks, )
Theme:
खड़ीबोली और खुसरो की काव्य धारा
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Literature.")
प्रारम्भिक खड़ीबोली और खुसरो की कविता।
Introduction
प्रारम्भिक खड़ीबोली का उद्भव 13वीं शताब्दी में हुआ, जिसमें अमीर खुसरो का योगदान महत्वपूर्ण है। खुसरो ने खड़ीबोली में कविता लिखकर इसे साहित्यिक मान्यता दी। उनकी रचनाएँ, जैसे "खालिक बारी", खड़ीबोली के विकास में मील का पत्थर साबित हुईं। खुसरो की कविता में सूफी विचारधारा और हिंदवी भाषा का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जिससे खड़ीबोली को एक नई पहचान मिली। रामचंद्र शुक्ल ने खुसरो को खड़ीबोली का प्रथम कवि माना है।
खड़ीबोली और खुसरो की काव्य धारा
● प्रारंभिक खड़ीबोली:
○ यह एक समूह-भाषा है जो आज के हिन्दी-प्रदेश की 18 बोलियों से निष्पन्न है।
○ इसका विकास अपभ्रंश या अवहट्ट के विभिन्न रूपों से हुआ है।
○ प्रारंभिक हिन्दी का काल मुख्यतः 1000 ई. से 1800 ई. तक माना जाता है।
● अमीर खुसरो की कविता:
○ खुसरो के काव्य में सामान्य भारतीय मनुष्य की सहजता है।
○ उन्होंने दरबार के फारसी पांडित्य से अलग लोकभाषा में जनता की अनुभूति को अभिव्यक्त किया।
○ उनकी रचनाओं में पहेलियाँ, मुकरियाँ, और दो सखुन शामिल हैं, जिनमें खड़ीबोली का प्रयोग मिलता है।
● उदाहरण:
● पहेली: "एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर आँधा धरा। चारों ओर वह थाल फिरे, मोती उससे एक न गिरे।"
● दो सखुन: "पान क्यों सड़ा, घोड़ा क्यों अड़ा - फेरा न था।"
● भाषा और संस्कृति:
○ सांस्कृतिक समन्वय के कारण प्रारंभिक खड़ीबोली में अरबी-फारसी और तुर्की के शब्दों की संख्या बढ़ गई।
○ खुसरो की भाषा विशेषतः पहेलियों और मुकरियों में खड़ीबोली का वही रूप है जो आज विद्यमान है।
● इतिहासकारों की दृष्टि:
○ इतिहासकार डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, यदि खुसरो के बाद ब्रजभाषा के बजाय खड़ीबोली हिन्दी में नियमित रचनाएँ होती रहतीं, तो आज की खड़ीबोली हिन्दी कविता अधिक परिमार्जित हो गई होती।
इन बिंदुओं के माध्यम से खड़ीबोली और खुसरो की कविता के बीच के संबंध और उनके योगदान को समझा जा सकता है।
○ यह एक समूह-भाषा है जो आज के हिन्दी-प्रदेश की 18 बोलियों से निष्पन्न है।
○ इसका विकास अपभ्रंश या अवहट्ट के विभिन्न रूपों से हुआ है।
○ प्रारंभिक हिन्दी का काल मुख्यतः 1000 ई. से 1800 ई. तक माना जाता है।
● अमीर खुसरो की कविता:
○ खुसरो के काव्य में सामान्य भारतीय मनुष्य की सहजता है।
○ उन्होंने दरबार के फारसी पांडित्य से अलग लोकभाषा में जनता की अनुभूति को अभिव्यक्त किया।
○ उनकी रचनाओं में पहेलियाँ, मुकरियाँ, और दो सखुन शामिल हैं, जिनमें खड़ीबोली का प्रयोग मिलता है।
● उदाहरण:
● पहेली: "एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर आँधा धरा। चारों ओर वह थाल फिरे, मोती उससे एक न गिरे।"
● दो सखुन: "पान क्यों सड़ा, घोड़ा क्यों अड़ा - फेरा न था।"
● भाषा और संस्कृति:
○ सांस्कृतिक समन्वय के कारण प्रारंभिक खड़ीबोली में अरबी-फारसी और तुर्की के शब्दों की संख्या बढ़ गई।
○ खुसरो की भाषा विशेषतः पहेलियों और मुकरियों में खड़ीबोली का वही रूप है जो आज विद्यमान है।
● इतिहासकारों की दृष्टि:
○ इतिहासकार डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, यदि खुसरो के बाद ब्रजभाषा के बजाय खड़ीबोली हिन्दी में नियमित रचनाएँ होती रहतीं, तो आज की खड़ीबोली हिन्दी कविता अधिक परिमार्जित हो गई होती।
इन बिंदुओं के माध्यम से खड़ीबोली और खुसरो की कविता के बीच के संबंध और उनके योगदान को समझा जा सकता है।
Conclusion
प्रारम्भिक खड़ीबोली ने हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसमें अमीर खुसरो की कविता विशेष स्थान रखती है। खुसरो की रचनाएँ खड़ीबोली के विकास का आधार बनीं। उनकी कविता में हिंदवी और फारसी का अनूठा संगम है। खुसरो ने कहा, "खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।" खड़ीबोली ने आगे चलकर आधुनिक हिंदी का रूप लिया। भविष्य में, खड़ीबोली के अध्ययन से भाषा के विकास और सांस्कृतिक समन्वय को समझने में मदद मिलेगी।