खड़ी बोली के विकास में सिद्ध-नाथ साहित्य का योगदान।
(UPSC 2019, 10 Marks, )
Theme:
सिद्ध-नाथ साहित्य का खड़ी बोली में योगदान
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Hindi Literature.")
खड़ी बोली के विकास में सिद्ध-नाथ साहित्य का योगदान।
खड़ी बोली के विकास में सिद्ध-नाथ साहित्य का योगदान।
(UPSC 2019, 10 Marks, )
Theme:
सिद्ध-नाथ साहित्य का खड़ी बोली में योगदान
Where in Syllabus:
(The subject of the above question is "Hindi Literature.")
खड़ी बोली के विकास में सिद्ध-नाथ साहित्य का योगदान।
Introduction
सिद्ध-नाथ साहित्य का खड़ी बोली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच, गोरखनाथ और कान्हपा जैसे सिद्ध-नाथ कवियों ने खड़ी बोली में रचनाएँ कीं, जिससे यह भाषा साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। इन कवियों की रचनाओं में सरलता और सहजता थी, जिसने खड़ी बोली को जनमानस में लोकप्रिय बनाया। इस साहित्य ने खड़ी बोली को एक सशक्त साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित करने में मदद की।
सिद्ध-नाथ साहित्य का खड़ी बोली में योगदान
● सिद्ध साहित्य का योगदान:
● सिद्धाचार्य: ये बौद्ध धर्म के वज्रयानी परंपरा से जुड़े थे और 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच सक्रिय रहे। इन्होंने सहज सुबोध दोहों और चर्यापदों के माध्यम से साधना मार्ग का संदेश दिया।
● भाषा का विकास: इनके दोहे और पद प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के साथ-साथ अवधी, ब्रज, राजस्थानी और कौरवी (खड़ी बोली) के तत्वों को समाहित करते थे। उदाहरण: "अपने रचि रचि भव निर्वाणा, मिथ्या लोक बंधावै अपना"।
● नाथ साहित्य का योगदान:
● नाथपंथी योगी: 10वीं से 14वीं शताब्दी के बीच सक्रिय रहे। इनकी भाषा में खड़ी बोली का पूर्वाभास मिलता है।
● भाषा का समन्वय: नाथों की वाणी में विभिन्न जन-बोलियों का समन्वय था, जिससे खड़ी बोली का विकास हुआ। उदाहरण: "शील व्रत, संतोष व्रत, छिमा, दया व्रत, दान"।
● गोरखनाथ की उलटबांसी: "गोरख बोले उल्टी बानी बरसेगी कंबली भींजेगा पानी" में खड़ी बोली का भविष्यत् काल बोधक 'ग' प्रत्यय मौजूद है।
● भाषा के तत्व:
● सर्वनाम और क्रियापद: सिद्ध और नाथ साहित्य में अपना, मैं जैसे सर्वनाम और बंधावै जैसे क्रियापद खड़ी बोली की झलक प्रस्तुत करते हैं।
● अन्तर्जनपदीय तत्व: नाथपंथियों की भाषा में अन्तर्जनपदीय तत्व अधिक थे, जिससे खड़ी बोली का विकास हुआ।
● प्रकाशन और अध्ययन:
● डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने 'गोरखवाणी' नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें गोरखनाथ की रचनाएँ शामिल हैं।
इन बिंदुओं के माध्यम से सिद्ध-नाथ साहित्य ने खड़ी बोली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
● सिद्धाचार्य: ये बौद्ध धर्म के वज्रयानी परंपरा से जुड़े थे और 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच सक्रिय रहे। इन्होंने सहज सुबोध दोहों और चर्यापदों के माध्यम से साधना मार्ग का संदेश दिया।
● भाषा का विकास: इनके दोहे और पद प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के साथ-साथ अवधी, ब्रज, राजस्थानी और कौरवी (खड़ी बोली) के तत्वों को समाहित करते थे। उदाहरण: "अपने रचि रचि भव निर्वाणा, मिथ्या लोक बंधावै अपना"।
● नाथ साहित्य का योगदान:
● नाथपंथी योगी: 10वीं से 14वीं शताब्दी के बीच सक्रिय रहे। इनकी भाषा में खड़ी बोली का पूर्वाभास मिलता है।
● भाषा का समन्वय: नाथों की वाणी में विभिन्न जन-बोलियों का समन्वय था, जिससे खड़ी बोली का विकास हुआ। उदाहरण: "शील व्रत, संतोष व्रत, छिमा, दया व्रत, दान"।
● गोरखनाथ की उलटबांसी: "गोरख बोले उल्टी बानी बरसेगी कंबली भींजेगा पानी" में खड़ी बोली का भविष्यत् काल बोधक 'ग' प्रत्यय मौजूद है।
● भाषा के तत्व:
● सर्वनाम और क्रियापद: सिद्ध और नाथ साहित्य में अपना, मैं जैसे सर्वनाम और बंधावै जैसे क्रियापद खड़ी बोली की झलक प्रस्तुत करते हैं।
● अन्तर्जनपदीय तत्व: नाथपंथियों की भाषा में अन्तर्जनपदीय तत्व अधिक थे, जिससे खड़ी बोली का विकास हुआ।
● प्रकाशन और अध्ययन:
● डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने 'गोरखवाणी' नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें गोरखनाथ की रचनाएँ शामिल हैं।
इन बिंदुओं के माध्यम से सिद्ध-नाथ साहित्य ने खड़ी बोली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
Conclusion
सिद्ध-नाथ साहित्य ने खड़ी बोली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस साहित्य ने भाषा को सरल और जनसाधारण के लिए सुलभ बनाया। गोरखनाथ और कान्हपा जैसे संतों ने खड़ी बोली में रचनाएँ कीं, जिससे यह भाषा साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, "सिद्धों की वाणी ने खड़ी बोली को साहित्यिक रूप दिया।" आगे चलकर, खड़ी बोली ने हिंदी साहित्य में प्रमुख स्थान प्राप्त किया, जिससे यह आधुनिक हिंदी की नींव बनी।