सिद्ध-नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप।
(UPSC 2022, 10 Marks, )
Theme:
सिद्ध-नाथ साहित्य की खड़ी बोली का स्वरूप
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
सिद्ध-नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप।
सिद्ध-नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप।
(UPSC 2022, 10 Marks, )
Theme:
सिद्ध-नाथ साहित्य की खड़ी बोली का स्वरूप
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
सिद्ध-नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप।
Introduction
सिद्ध-नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप मध्यकालीन भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वानों ने इसे जनभाषा के रूप में पहचाना। खड़ी बोली का प्रयोग सिद्ध-नाथ कवियों ने सरल और स्पष्ट अभिव्यक्ति के लिए किया, जिससे यह जनसामान्य के बीच लोकप्रिय हुई। इस बोली ने साहित्यिक और सांस्कृतिक संवाद को सुलभ बनाया, जिससे यह साहित्यिक विकास का आधार बनी।
सिद्ध-नाथ साहित्य की खड़ी बोली का स्वरूप
● सिद्ध साहित्य: सिद्ध संप्रदाय से संबंधित साहित्य, जिसमें तांत्रिक क्रियाओं और मंत्रों द्वारा सिद्धि प्राप्त करने की प्रक्रिया का वर्णन है।
● नाथ साहित्य: सिद्ध संप्रदाय से विकसित, लेकिन इसके विरोधी भी नाथ संप्रदाय के थे।
● खड़ी बोली का विकास:
○ हिंदी में गद्य-रचना के विकास के साथ खड़ी बोली का प्रभावी रूप में विकास हुआ।
○ आदि काल में डिंगल-पिंगल में रचना होती थी, जबकि मध्यकाल में अवधी और ब्रजभाषा काव्य-रचना की आधार भाषा थी।
○ आधुनिक युग में हिंदी का यही रूप साहित्य-सृजन का आधार बना।
● भाषा की एकरूपता:
○ हिंदी भाषा में एकरूपता और बोधगम्यता बढ़ाने का प्रयास लंबे समय से चल रहा था।
● जैन, सिद्ध, और नाथ साहित्य में खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप देखा जा सकता है।
● चर्यापदों का प्रभाव:
○ सिद्धों ने मध्यप्रदेश के पूर्वी भागों में आठवीं-नौवीं शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक चर्यापदों के रूप में जनभाषा के माध्यम से साहित्य की रचना की।
○ इस पर अर्द्धमगधी अपभ्रंश और आरंभिक खड़ी बोली की प्रवृत्तियों का स्पष्ट असर दिखाई देता है।
● उदाहरण:
○ "घर की बाइसी दीवा जाली। कोणहिं बड़सी घंडा चाली।"
○ "पंडिअ सअल सत्य बक्खाणअं देहहिं बुद्ध बसंत ण जाणआ"
● भाषा की विशेषताएं:
● ईकारांत या आकारांत शब्द जैसे बाइसी, दीवा, जाली, चाली।
○ 'न' के स्थान पर 'ण' का प्रयोग, जो आरंभिक खड़ी बोली की विशेषता है।
● नाथ साहित्य में खड़ी बोली:
○ नाथों ने अपनी मान्यताओं को प्रचारित करने हेतु रचनाएं लिखीं।
○ घुमक्कड़ प्रवृत्ति के कारण खड़ी बोली के साथ अन्य हिंदी बोलियों का भी इस पर व्यापक असर दिखाई पड़ता है।
○ कहीं-कहीं इनकी भाषा वर्तमानकालीन खड़ी बोली के निकट दिखाई पड़ती है।
● उदाहरण:
○ "नौ लाख पातरि आगे नाचे पीछे सहज अखाड़ा।"
○ "ऐसौ मन लै जोगी खेलै तब अंतरि बसै भंडारा।"
● सीमित प्रवृत्तियां:
○ नाथ साहित्य में कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिनमें खड़ी बोली की कुछ प्रवृत्तियां दिखती हैं, किंतु बेहद सीमित मात्रा में।
○ उदाहरण: "जाणि के अजाणि होय बात तू लें पछाणि चेले हो दूआ लाभ हाइगा गुरू होइयों अनि।"
● नाथ साहित्य: सिद्ध संप्रदाय से विकसित, लेकिन इसके विरोधी भी नाथ संप्रदाय के थे।
● खड़ी बोली का विकास:
○ हिंदी में गद्य-रचना के विकास के साथ खड़ी बोली का प्रभावी रूप में विकास हुआ।
○ आदि काल में डिंगल-पिंगल में रचना होती थी, जबकि मध्यकाल में अवधी और ब्रजभाषा काव्य-रचना की आधार भाषा थी।
○ आधुनिक युग में हिंदी का यही रूप साहित्य-सृजन का आधार बना।
● भाषा की एकरूपता:
○ हिंदी भाषा में एकरूपता और बोधगम्यता बढ़ाने का प्रयास लंबे समय से चल रहा था।
● जैन, सिद्ध, और नाथ साहित्य में खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप देखा जा सकता है।
● चर्यापदों का प्रभाव:
○ सिद्धों ने मध्यप्रदेश के पूर्वी भागों में आठवीं-नौवीं शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक चर्यापदों के रूप में जनभाषा के माध्यम से साहित्य की रचना की।
○ इस पर अर्द्धमगधी अपभ्रंश और आरंभिक खड़ी बोली की प्रवृत्तियों का स्पष्ट असर दिखाई देता है।
● उदाहरण:
○ "घर की बाइसी दीवा जाली। कोणहिं बड़सी घंडा चाली।"
○ "पंडिअ सअल सत्य बक्खाणअं देहहिं बुद्ध बसंत ण जाणआ"
● भाषा की विशेषताएं:
● ईकारांत या आकारांत शब्द जैसे बाइसी, दीवा, जाली, चाली।
○ 'न' के स्थान पर 'ण' का प्रयोग, जो आरंभिक खड़ी बोली की विशेषता है।
● नाथ साहित्य में खड़ी बोली:
○ नाथों ने अपनी मान्यताओं को प्रचारित करने हेतु रचनाएं लिखीं।
○ घुमक्कड़ प्रवृत्ति के कारण खड़ी बोली के साथ अन्य हिंदी बोलियों का भी इस पर व्यापक असर दिखाई पड़ता है।
○ कहीं-कहीं इनकी भाषा वर्तमानकालीन खड़ी बोली के निकट दिखाई पड़ती है।
● उदाहरण:
○ "नौ लाख पातरि आगे नाचे पीछे सहज अखाड़ा।"
○ "ऐसौ मन लै जोगी खेलै तब अंतरि बसै भंडारा।"
● सीमित प्रवृत्तियां:
○ नाथ साहित्य में कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिनमें खड़ी बोली की कुछ प्रवृत्तियां दिखती हैं, किंतु बेहद सीमित मात्रा में।
○ उदाहरण: "जाणि के अजाणि होय बात तू लें पछाणि चेले हो दूआ लाभ हाइगा गुरू होइयों अनि।"
Conclusion
सिद्ध-नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप सरल और सहज है, जो जनसाधारण की भाषा को दर्शाता है। इस साहित्य में गोरखनाथ और कबीर जैसे संतों ने खड़ी बोली का उपयोग कर भक्ति और ज्ञान का प्रसार किया। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, यह बोली विचारों की स्पष्टता और संप्रेषणीयता में सहायक रही है। आगे बढ़ते हुए, खड़ी बोली का अध्ययन और संरक्षण आवश्यक है ताकि इसकी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित किया जा सके।