हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान।
(UPSC 2022, 10 Marks, )
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान।
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान।
(UPSC 2022, 10 Marks, )
Introduction
अपभ्रंश भाषा, 6वीं से 12वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में प्रचलित, आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की जननी मानी जाती है। यह प्राकृत और आधुनिक भाषाओं के बीच की कड़ी है। अपभ्रंश ने खड़ी बोली में हिंदी के भाषिक और साहित्यिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ध्वनिगत और व्याकरणिक परिवर्तन जैसे ध्वनि परिवर्तन, संज्ञा रूपों का सरलीकरण, और संयुक्त क्रिया का प्रयोग हिंदी में अपभ्रंश से आया। साहित्यिक रूप में, दोहा छंद और कथा रूढ़ियों का प्रभाव भी अपभ्रंश से लिया गया।
Explanation
अपभ्रंश का हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यह भाषा प्राकृत और आधुनिक भाषाओं के बीच की कड़ी थी और हिन्दी के भाषिक और साहित्यिक विकास में इसका विशेष स्थान है।
भाषिक योगदान:
1. ध्वनिगत परिवर्तन: अपभ्रंश में ध्वनि परिवर्तन के नियम हिन्दी में भी अपनाए गए। उदाहरण के लिए, "यत्" का "जत्" और फिर "जो" में परिवर्तन।
2. संस्कृत ध्वनियों का समावेश: अपभ्रंश में 'ड़' और 'ढ़' ध्वनियों का प्रयोग हुआ, जिसे हिन्दी ने भी अपनाया।
3. अन्त्य स्वर का लोप: अपभ्रंश से हिन्दी ने अन्त्य स्वर के लोप की प्रवृत्ति ग्रहण की, जैसे "अग्नि" से "आग"।
4. संयुक्त व्यंजनों का सरलीकरण: अपभ्रंश में संयुक्त व्यंजनों का सरलीकरण हुआ, जैसे "चतुष्क" से "चौक"।
5. महाप्राण ध्वनियों का सरलीकरण: अपभ्रंश में महाप्राण ध्वनियों के स्थान पर 'ह' का प्रयोग हुआ, जैसे "कथानिका" से "कहानी"।
व्याकरणिक योगदान:
1. विभक्तियों का सरलीकरण: अपभ्रंश में विभक्तियों का सरलीकरण हुआ, जो हिन्दी में भी जारी रहा।
2. लिंग और वचन का सरलीकरण: अपभ्रंश में लिंग और वचन की संख्या कम होकर दो रह गई, जो हिन्दी में भी स्वीकृत हुई।
3. संयुक्त क्रिया का प्रयोग: अपभ्रंश से हिन्दी में संयुक्त क्रिया के प्रयोग की प्रवृत्ति आई, जैसे "आया", "आ गया"।
4. देशी धातुओं का समावेश: अपभ्रंश में कुछ धातुएं देशी आधार पर बनीं, जैसे "छड़" से "छोड़"।
साहित्यिक योगदान:
1. छन्दों का प्रयोग: दोहा छन्द का प्रयोग सबसे पहले अपभ्रंश में हुआ, जो हिन्दी में आज तक प्रचलित है।
2. कथा रूढ़ियों का प्रयोग: अपभ्रंश काव्य से कथा रूढ़ियों के प्रयोग की प्रवृत्ति हिन्दी में आई।
3. सिद्धों और नाथों की पद रचना: हिन्दी के संत कवियों ने सिद्धों और नाथों की पद रचना से प्रेरणा ग्रहण की।
4. जैन कवियों से प्रेरणा: जैन कवियों से प्रबन्ध काव्य तथा चरितकाव्य की परम्परा हिन्दी में आई।
अपभ्रंश ने हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे हिन्दी की ध्वनिगत, व्याकरणिक और साहित्यिक संरचना को समृद्धि मिली।
भाषिक योगदान:
1. ध्वनिगत परिवर्तन: अपभ्रंश में ध्वनि परिवर्तन के नियम हिन्दी में भी अपनाए गए। उदाहरण के लिए, "यत्" का "जत्" और फिर "जो" में परिवर्तन।
2. संस्कृत ध्वनियों का समावेश: अपभ्रंश में 'ड़' और 'ढ़' ध्वनियों का प्रयोग हुआ, जिसे हिन्दी ने भी अपनाया।
3. अन्त्य स्वर का लोप: अपभ्रंश से हिन्दी ने अन्त्य स्वर के लोप की प्रवृत्ति ग्रहण की, जैसे "अग्नि" से "आग"।
4. संयुक्त व्यंजनों का सरलीकरण: अपभ्रंश में संयुक्त व्यंजनों का सरलीकरण हुआ, जैसे "चतुष्क" से "चौक"।
5. महाप्राण ध्वनियों का सरलीकरण: अपभ्रंश में महाप्राण ध्वनियों के स्थान पर 'ह' का प्रयोग हुआ, जैसे "कथानिका" से "कहानी"।
व्याकरणिक योगदान:
1. विभक्तियों का सरलीकरण: अपभ्रंश में विभक्तियों का सरलीकरण हुआ, जो हिन्दी में भी जारी रहा।
2. लिंग और वचन का सरलीकरण: अपभ्रंश में लिंग और वचन की संख्या कम होकर दो रह गई, जो हिन्दी में भी स्वीकृत हुई।
3. संयुक्त क्रिया का प्रयोग: अपभ्रंश से हिन्दी में संयुक्त क्रिया के प्रयोग की प्रवृत्ति आई, जैसे "आया", "आ गया"।
4. देशी धातुओं का समावेश: अपभ्रंश में कुछ धातुएं देशी आधार पर बनीं, जैसे "छड़" से "छोड़"।
साहित्यिक योगदान:
1. छन्दों का प्रयोग: दोहा छन्द का प्रयोग सबसे पहले अपभ्रंश में हुआ, जो हिन्दी में आज तक प्रचलित है।
2. कथा रूढ़ियों का प्रयोग: अपभ्रंश काव्य से कथा रूढ़ियों के प्रयोग की प्रवृत्ति हिन्दी में आई।
3. सिद्धों और नाथों की पद रचना: हिन्दी के संत कवियों ने सिद्धों और नाथों की पद रचना से प्रेरणा ग्रहण की।
4. जैन कवियों से प्रेरणा: जैन कवियों से प्रबन्ध काव्य तथा चरितकाव्य की परम्परा हिन्दी में आई।
अपभ्रंश ने हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे हिन्दी की ध्वनिगत, व्याकरणिक और साहित्यिक संरचना को समृद्धि मिली।
Conclusion
अपभ्रंश भाषा ने हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह भाषा 6वीं से 12वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में प्रचलित थी और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की जननी मानी जाती है। अपभ्रंश ने ध्वनिगत, व्याकरणिक और साहित्यिक स्तर पर हिन्दी को समृद्ध किया। संस्कृत के जटिल नियमों को सरल बनाकर हिन्दी में समाहित किया गया। दोहा छन्द और संत काव्य की प्रेरणा भी अपभ्रंश से मिली। राष्ट्रकूट और पाल राजाओं ने इसे संरक्षित किया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे हिन्दी का आधार बताया।