हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी युग का योगदान।
(UPSC 2023, 10 Marks, )
Theme:
द्विवेदी युग: हिंदी भाषा का मानकीकरण
Where in Syllabus:
(Modern Hindi Literature)
हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी युग का योगदान।
हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी युग का योगदान।
(UPSC 2023, 10 Marks, )
Theme:
द्विवेदी युग: हिंदी भाषा का मानकीकरण
Where in Syllabus:
(Modern Hindi Literature)
हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी युग का योगदान।
Introduction
द्विवेदी युग (1900-1920) हिंदी भाषा के मानकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी को एक सुसंगठित और मानकीकृत रूप देने का प्रयास किया। उन्होंने भाषा को सरल, वैज्ञानिक और व्याकरण सम्मत बनाने पर जोर दिया। इस काल में भारतेन्दु हरिश्चंद्र और बालकृष्ण भट्ट जैसे विचारकों ने भी हिंदी के विकास में योगदान दिया, जिससे हिंदी साहित्य और भाषा का व्यापक प्रसार हुआ।
द्विवेदी युग: हिंदी भाषा का मानकीकरण
● द्विवेदी युग (1900-1920): यह युग हिंदी भाषा के मानकीकरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। इस दौरान महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली के मानकीकरण का आंदोलन चलाया।
● खड़ी बोली का विकास: द्विवेदी जी के प्रयासों से खड़ी बोली का स्वरूप स्थिर, निश्चित, सुघड़ और मधुर बना। गद्य और पद्य की भाषा का एकीकरण हुआ और खड़ी बोली दोनों में स्थापित हुई।
● अनुवाद कार्य: द्विवेदी जी ने संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला से हिंदी में अनुवाद किए और करवाए, जिससे खड़ी बोली का विकास हुआ।
● शैली और वाक्य विन्यास: इस युग में परिमार्जित शैली का विकास हुआ। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे पहचानते हुए कहा कि लेखकों की शैली में उनकी निज की शिष्टता रहती थी। वाक्य विन्यास में अधिक सफाई और व्यवस्था आई।
● विराम चिह्नों का प्रयोग: लेखकों के प्रयास से हिंदी की अर्थोद्घाटिनी शक्ति और अभिव्यंजन प्रणाली का प्रसार हुआ।
● साहित्य में खड़ी बोली का स्थान: द्विवेदी युग में खड़ी बोली हिंदी साहित्य की मुख्य भाषा बन गई।
● कामता प्रसाद गुरु का योगदान: द्विवेदी जी की प्रेरणा से कामता प्रसाद गुरु ने 'हिन्दी व्याकरण' के नाम से एक वृहद व्याकरण लिखा।
● स्वतंत्रता के बाद का परिदृश्य: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी के मानकीकरण पर नए सिरे से विचार-विमर्श शुरू हुआ, क्योंकि संविधान ने इसे राजभाषा के रूप में स्थापित किया।
● खड़ी बोली का विकास: द्विवेदी जी के प्रयासों से खड़ी बोली का स्वरूप स्थिर, निश्चित, सुघड़ और मधुर बना। गद्य और पद्य की भाषा का एकीकरण हुआ और खड़ी बोली दोनों में स्थापित हुई।
● अनुवाद कार्य: द्विवेदी जी ने संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला से हिंदी में अनुवाद किए और करवाए, जिससे खड़ी बोली का विकास हुआ।
● शैली और वाक्य विन्यास: इस युग में परिमार्जित शैली का विकास हुआ। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे पहचानते हुए कहा कि लेखकों की शैली में उनकी निज की शिष्टता रहती थी। वाक्य विन्यास में अधिक सफाई और व्यवस्था आई।
● विराम चिह्नों का प्रयोग: लेखकों के प्रयास से हिंदी की अर्थोद्घाटिनी शक्ति और अभिव्यंजन प्रणाली का प्रसार हुआ।
● साहित्य में खड़ी बोली का स्थान: द्विवेदी युग में खड़ी बोली हिंदी साहित्य की मुख्य भाषा बन गई।
● कामता प्रसाद गुरु का योगदान: द्विवेदी जी की प्रेरणा से कामता प्रसाद गुरु ने 'हिन्दी व्याकरण' के नाम से एक वृहद व्याकरण लिखा।
● स्वतंत्रता के बाद का परिदृश्य: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी के मानकीकरण पर नए सिरे से विचार-विमर्श शुरू हुआ, क्योंकि संविधान ने इसे राजभाषा के रूप में स्थापित किया।
Conclusion
द्विवेदी युग ने हिंदी भाषा के मानकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा को सरल, सुगम और व्याकरण सम्मत बनाने पर जोर दिया। उन्होंने साहित्य में खड़ी बोली को प्रोत्साहित किया और हिंदी को एक सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित किया। इस युग में सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन हुआ, जिसने भाषा के विकास में अहम भूमिका निभाई। आगे बढ़ते हुए, हमें भाषा के विविध रूपों को समाहित करते हुए इसे और समृद्ध बनाना चाहिए।