साहित्यिक भाषा के रूप में अवध के महत्त्व का आकलन कीजिए। (UPSC 2021, 20 Marks, )

Theme: अवध की साहित्यिक भाषा का महत्त्व Where in Syllabus: (Hindi Literature)
साहित्यिक भाषा के रूप में अवध के महत्त्व का आकलन कीजिए।

Introduction

अवध क्षेत्र का साहित्यिक भाषा के रूप में महत्त्व अत्यधिक है। रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वानों ने इसे हिंदी साहित्य की समृद्धि का केंद्र माना है। अवध की भाषा ने तुलसीदास और सूरदास जैसे कवियों के माध्यम से भक्ति साहित्य को नया आयाम दिया। इसकी भाषा में सरलता और भावप्रवणता है, जो इसे जनमानस के करीब लाती है। अवधी ने लोकगीतों और लोककथाओं के माध्यम से सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित किया है।

अवध की साहित्यिक भाषा का महत्त्व

 ● अवधी का विकास: अवधी भाषा अर्द्धमागधी अपभ्रंश से विकसित हुई और इसका स्वर्णकाल 1400-1700 ई. के बीच माना जाता है। यह मुख्यतः लखीमपुर खीरी, गौंडा, बहराइच, बाराबंकी, लखनऊ, सीतापुर, फैजाबाद, उन्नाव, रायबरेली आदि क्षेत्रों में बोली जाती है।  
  ● सूफी कवियों का योगदान:  
    ● मूल्ला दाउद की रचना 'चन्दायन' ने अवधी को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया।  
    ● जायसी की 'पद्मावती' ने अवधी को साहित्यिक भाषा के रूप में एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया।  
        ○ अन्य योगदानकर्ताओं में कृतवन (मृगावती), उस्मान (चित्रावली), नूर मुहम्मद (इन्द्रावती/अनुराग बांसुरी) शामिल हैं।
  ● रामकाव्यधारा में तुलसी का योगदान:  
    ● गोस्वामी तुलसीदास की 'रामचरितमानस' ने अवधी को लोकमंगल और औदात्यपूर्ण भाषा के रूप में स्थापित किया।  
        ○ तुलसीदास ने अवधी के साथ तत्सम, अरबी-फारसी शब्दों का समावेश किया और ठेठ अवधी शब्दों का प्रयोग किया।
  ● भाषाई विशेषताएँ:  
        ○ अवधी भाषा में ध्वनि मैत्री, अनुप्रास अलंकार का प्रयोग देखा जाता है, जैसे "सिंधल अंग पग मग डोलहिं" और "जलचर, थलचर, नभचर, नाना"
        ○ तुलसीदास ने अनुप्रास, उपमा, सांगरूपक अलंकार का प्रयोग कर अवधी को गहरे कलात्मक स्तर पर स्थापित किया।
  ● साहित्यिक महत्त्व:  
        ○ अवधी भाषा ने मध्यकाल में प्रमुख काव्यभाषा के रूप में अपनी पहचान बनाई।
    ● रामचरितमानस के रूप में रचित रामकथा हर भारतीय की आत्मा बन चुकी है।  
        ○ अवधी की मिठास, ठेठपन और लोकसंस्कृति के जुड़ाव के कारण यह एक प्रमुख साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित हुई।

Conclusion

अवध की साहित्यिक भाषा का महत्त्व उसके समृद्ध साहित्यिक योगदान में निहित है। तुलसीदास और सूरदास जैसे कवियों ने इसे प्रतिष्ठित किया। रामचरितमानस और सूरसागर जैसे ग्रंथों ने इसे जन-जन तक पहुँचाया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिंदी साहित्य का आधार बताया। भविष्य में, इस भाषा की प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए इसे शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल करना आवश्यक है। "भाषा संस्कृति की आत्मा होती है," इस कथन के अनुसार, अवध की भाषा को संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है।