मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में अवध का विकास। (UPSC 2013, 10 Marks, )

Theme: मध्यकालीन काव्यभाषा के रूप में अवध का विकास Where in Syllabus: (Medieval Indian Literature)
मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में अवध का विकास।

Introduction

मध्यकाल में अवध क्षेत्र की काव्यभाषा का विकास महत्वपूर्ण था, जिसमें तुलसीदास और कबीर जैसे कवियों ने योगदान दिया। इस काल में भक्ति आंदोलन के प्रभाव से भाषा सरल और जनसुलभ बनी। रामचरितमानस और साखी जैसे ग्रंथों ने अवध की भाषा को साहित्यिक मान्यता दी। इस दौरान, काव्यभाषा ने धार्मिक और सामाजिक संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मध्यकालीन काव्यभाषा के रूप में अवध का विकास

 ● अवधी का उद्गम:  
    ● अवधी का नाम अयोध्या से निकला है, जो लखनऊ-फैजाबाद क्षेत्र की भाषा है।  
    ● कोसल क्षेत्र की भाषा कोसली थी, जो बाद में अवधी के रूप में विकसित हुई।  
  ● प्रारंभिक उल्लेख:  
    ● अमीर खुसरो की रचना 'खालिकबारी' में अवधी का उल्लेख मिलता है।  
    ● तेरहवीं-चौदहवीं सदी तक अवधी एक उच्च भाषा के रूप में स्थापित हो गई।  
  ● सूफी कवियों का योगदान:  
    ● सूफी कवियों ने अवधी में रचनाएं रचकर इसे मार्मिकता प्रदान की।  
  ● तुलसीदास का योगदान:  
    ● तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसे ग्रंथों में अवधी का उपयोग कर इसे सुसंस्कृत भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया।  
  ● अन्य उल्लेखनीय रचनाएं:  
    ● कोंडा कृत '213 लबेल' और दामोदर पडित कृत 'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' में भी अवधी का उपयोग देखा जा सकता है।  
  ● मध्यकाल में प्रतिष्ठा:  
        ○ मध्यकाल में अवधी एक महत्वपूर्ण काव्यभाषा के रूप में स्थापित हो चुकी थी।

Conclusion

मध्यकाल में अवध की काव्यभाषा का विकास महत्वपूर्ण था, जिसमें तुलसीदास और कबीर जैसे कवियों ने योगदान दिया। इस काल में भक्ति आंदोलन ने भाषा को जनसाधारण के करीब लाया। रामचरितमानस और साखी जैसे ग्रंथों ने साहित्य को समृद्ध किया। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, "अवधी ने जनमानस को जोड़ने का कार्य किया।" आगे बढ़ने के लिए, इस भाषा की समृद्धि और विविधता को संरक्षित करना आवश्यक है।