ज्ञान-विज्ञान की हिन्दी के विकास में पारिभाषिक शब्दावली क्यों आवश्यक है ? समझाइए।
(UPSC 2020, 15 Marks, )
Theme:
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली का महत्व
Where in Syllabus:
(Hindi Language Development)
ज्ञान-विज्ञान की हिन्दी के विकास में पारिभाषिक शब्दावली क्यों आवश्यक है ? समझाइए।
ज्ञान-विज्ञान की हिन्दी के विकास में पारिभाषिक शब्दावली क्यों आवश्यक है ? समझाइए।
(UPSC 2020, 15 Marks, )
Theme:
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली का महत्व
Where in Syllabus:
(Hindi Language Development)
ज्ञान-विज्ञान की हिन्दी के विकास में पारिभाषिक शब्दावली क्यों आवश्यक है ? समझाइए।
Introduction
ज्ञान-विज्ञान की हिन्दी के विकास में पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकता को समझने के लिए महात्मा गांधी और रामधारी सिंह दिनकर जैसे विचारकों ने इसके महत्व पर जोर दिया है। पारिभाषिक शब्दावली भाषा को वैज्ञानिक और तकनीकी विषयों में सशक्त बनाती है, जिससे ज्ञान का प्रसार और अनुसंधान में वृद्धि होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी इस दिशा में हिन्दी के विकास को प्रोत्साहित करती है, जिससे भाषा की समृद्धि और उपयोगिता बढ़ती है।
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली का महत्व
● पारिभाषिक शब्दावली का महत्व: पारिभाषिक शब्दावली पारिभाषिक शब्दों का समूह है, जो विद्वान मंडली द्वारा बनाए जाते हैं। यह शब्दावली अंग्रेजी शब्दों के पर्याय के रूप में निर्मित की गई है, जिससे हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान का विकास हो सके।
● अनुवाद प्रक्रिया: पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में अनुवाद प्रक्रिया निहित होती है। यह प्रक्रिया मौलिक विशेषज्ञ ज्ञान और अनुवाद पर्याय के बीच मध्यस्थ शब्दावली की स्थिति को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, भारत में अंग्रेजी शब्दावली मध्यस्थ शब्दावली की भूमिका निभा रही है।
● शब्दावली निर्माण की जटिलता: पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण सरल प्रक्रिया नहीं है। यह अनेक मत, सिद्धान्त, प्रयोग और उपयोगिता के आधार पर निर्मित की गई है। दो अलग-अलग संस्कृतियों में शब्दों के पर्याय निश्चित करना अत्यंत कठिन कार्य है।
● संस्कृत का आधार: डॉ. रघुवीर ने प्रत्येक अंग्रेजी शब्द के लिए संस्कृत व्याकरण के अनुसार शब्द गढ़े। उन्होंने अरबी, फारसी, देशज शब्दों के स्थान पर संस्कृत का आधार लेकर नए शब्दों का निर्माण किया।
● अनुकूलन की प्रक्रिया: पारिभाषिक शब्द निर्माण में ग्रहण, संचयन और अनुकूलन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अनुकूलन से आशय है पूर्व प्रचलित शब्दों को पारिभाषिक शब्द के रूप में अनुकूलन करना। उदाहरण के लिए, 'इंजन' को 'एजिन', 'लालटैन' को 'लैन्टर्न' में बदल दिया गया।
● अनुकूलन के उदाहरण: दो भाषाओं के मध्य संधि अथवा समासीकरण भी अनुकूलन ही है। कम्प्यूटरीकरण, अपीलीय, कलैंडर वर्ष आदि शब्द इसी अनुकूलन की प्रक्रिया के अंतर्गत बने हैं।
● हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का समावेश: हिन्दी ने अनेक अंग्रेजी शब्दों को समाहित कर लिया है। इन्हें परिवर्तन, संशोधन के पश्चात् स्वीकार करना व्यावहारिक होगा। उदाहरण के लिए, कॉलेज, पुलिस, सुनामी शब्द का स्वीकार्य इसी अनुकूलन प्रक्रिया का परिणाम है।
● शब्दावली का योगदान: पारिभाषिक शब्दावली ने हिन्दी के व्यावहारिक, कामकाजी और प्रशासनिक क्षेत्र में प्रगति की है। यह हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
● विभिन्न क्षेत्रों में शब्दावली का विकास: ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं के लिए लगभग 08 लाख शब्द गढ़े गए हैं। विधि शब्दावली, मीडिया शब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, अंतरिक्ष शब्दावली, मानविकी एवं समाज विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली प्रकाशित एवं प्रचलित हो चुकी हैं।
● निरंतर प्रयोग से अर्थवत्ता: निरंतर प्रयोग से इनकी अर्थवत्ता सिद्ध हो चुकी है। पारिभाषिक शब्दावली हिन्दी के प्रयोजनीय पक्ष के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
● अनुवाद प्रक्रिया: पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में अनुवाद प्रक्रिया निहित होती है। यह प्रक्रिया मौलिक विशेषज्ञ ज्ञान और अनुवाद पर्याय के बीच मध्यस्थ शब्दावली की स्थिति को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, भारत में अंग्रेजी शब्दावली मध्यस्थ शब्दावली की भूमिका निभा रही है।
● शब्दावली निर्माण की जटिलता: पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण सरल प्रक्रिया नहीं है। यह अनेक मत, सिद्धान्त, प्रयोग और उपयोगिता के आधार पर निर्मित की गई है। दो अलग-अलग संस्कृतियों में शब्दों के पर्याय निश्चित करना अत्यंत कठिन कार्य है।
● संस्कृत का आधार: डॉ. रघुवीर ने प्रत्येक अंग्रेजी शब्द के लिए संस्कृत व्याकरण के अनुसार शब्द गढ़े। उन्होंने अरबी, फारसी, देशज शब्दों के स्थान पर संस्कृत का आधार लेकर नए शब्दों का निर्माण किया।
● अनुकूलन की प्रक्रिया: पारिभाषिक शब्द निर्माण में ग्रहण, संचयन और अनुकूलन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अनुकूलन से आशय है पूर्व प्रचलित शब्दों को पारिभाषिक शब्द के रूप में अनुकूलन करना। उदाहरण के लिए, 'इंजन' को 'एजिन', 'लालटैन' को 'लैन्टर्न' में बदल दिया गया।
● अनुकूलन के उदाहरण: दो भाषाओं के मध्य संधि अथवा समासीकरण भी अनुकूलन ही है। कम्प्यूटरीकरण, अपीलीय, कलैंडर वर्ष आदि शब्द इसी अनुकूलन की प्रक्रिया के अंतर्गत बने हैं।
● हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का समावेश: हिन्दी ने अनेक अंग्रेजी शब्दों को समाहित कर लिया है। इन्हें परिवर्तन, संशोधन के पश्चात् स्वीकार करना व्यावहारिक होगा। उदाहरण के लिए, कॉलेज, पुलिस, सुनामी शब्द का स्वीकार्य इसी अनुकूलन प्रक्रिया का परिणाम है।
● शब्दावली का योगदान: पारिभाषिक शब्दावली ने हिन्दी के व्यावहारिक, कामकाजी और प्रशासनिक क्षेत्र में प्रगति की है। यह हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
● विभिन्न क्षेत्रों में शब्दावली का विकास: ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं के लिए लगभग 08 लाख शब्द गढ़े गए हैं। विधि शब्दावली, मीडिया शब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, अंतरिक्ष शब्दावली, मानविकी एवं समाज विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली प्रकाशित एवं प्रचलित हो चुकी हैं।
● निरंतर प्रयोग से अर्थवत्ता: निरंतर प्रयोग से इनकी अर्थवत्ता सिद्ध हो चुकी है। पारिभाषिक शब्दावली हिन्दी के प्रयोजनीय पक्ष के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
Conclusion
ज्ञान-विज्ञान की हिन्दी के विकास में पारिभाषिक शब्दावली अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह भाषा को समृद्ध और सटीक बनाती है। महात्मा गांधी ने कहा था, "अपनी भाषा में शिक्षा से आत्मनिर्भरता आती है।" पारिभाषिक शब्दावली से जटिल विषयों की समझ आसान होती है और यह वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देती है। भारतीय भाषाओं में एकरूपता लाने के लिए यह महत्वपूर्ण है। आगे बढ़ने के लिए, शिक्षा नीति में इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए।