हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में आने वाली कठिनाइयों का परिचय दीजिए।
(UPSC 2021, 15 Marks, )
Theme:
हिन्दी पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की चुनौतियाँ
Where in Syllabus:
(Linguistics)
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में आने वाली कठिनाइयों का परिचय दीजिए।
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में आने वाली कठिनाइयों का परिचय दीजिए।
(UPSC 2021, 15 Marks, )
Theme:
हिन्दी पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की चुनौतियाँ
Where in Syllabus:
(Linguistics)
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में आने वाली कठिनाइयों का परिचय दीजिए।
Introduction
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की प्रक्रिया में कई कठिनाइयाँ आती हैं। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, भाषाई विविधता और तकनीकी शब्दों के अनुवाद में सटीकता की कमी प्रमुख चुनौतियाँ हैं। संस्कृत से शब्द ग्रहण करने की प्रवृत्ति और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभाव से भी जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं। भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय की कमी और वैश्विक संदर्भ में हिन्दी की स्थिति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है।
हिन्दी पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की चुनौतियाँ
हिंदी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में आने वाली कठिनाइयाँ
● अर्थ की वस्तुनिष्ठता: पारिभाषिक शब्दावली का अर्थ वस्तुनिष्ठ होता है और यह निश्चित क्षेत्र में प्रयोग की जाती है। इसका अभिधार्थ ग्रहण किया जाता है, लक्ष्यार्थ या व्यंग्यार्थ नहीं। उदाहरण के लिए, अर्थशास्त्र में 'मांग और पूर्ति'।
● विषय-सापेक्षता: पारिभाषिक शब्दावली की एक प्रमुख विशेषता इसका विषय-सापेक्ष होना है। जैसे, अर्थशास्त्र के लिए 'मांग और पूर्ति'।
● अर्थों का सूक्ष्मीकरण: पारिभाषिक शब्दावली में अर्थों का सूक्ष्मीकरण होता है, जिससे शब्दों का सही और सटीक अर्थ प्राप्त होता है।
ऐतिहासिक प्रयास
● रघुनाथ पंत: मध्यकाल में रघुनाथ पंत ने राजकीय शब्दावली के निर्माण का प्रयास किया।
● बंगाल सरकार: 1871 में बंगाल सरकार द्वारा एक समिति का गठन किया गया था।
● काशी नागरी प्रचारिणी सभा: 1889 में इस सभा ने 'हिंदी साइंटिफिक ग्लौसरी' का प्रकाशन किया।
● डॉ. रघुवीर: उन्होंने आंग्ल-भारतीय महाकोश प्रकाशित किया और 1955 में राजभाषा आयोग की संस्तुतियों के आधार पर वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग का गठन किया गया।
विवादित मत
● पुनरुत्थानवादी दृष्टिकोण: डॉ. रघुवीर ने अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं के शब्दों को बाहर कर संस्कृत का उपयोग करने पर जोर दिया। उदाहरण: स्टेशन के लिए 'स्थान'।
● लोकवादी दृष्टिकोण: श्री सुंदरलाल का मानना था कि पारिभाषिक शब्दावली सरल होनी चाहिए और हिंदुस्तानी शब्दों के आधार पर निर्मित होनी चाहिए।
● अंतर्राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण: बीरबल साहनी और शांतिस्वरूप भटनागर जैसे वैज्ञानिकों का मानना था कि अंतर्राष्ट्रीय शब्दावली को वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए जैसे उसका प्रयोग विकसित देशों की भाषाओं में होता है।
नीतियाँ और समाधान
● उपयुक्त शब्दों का अनुवाद: जिन शब्दों के लिए उपयुक्त शब्द हमारी भाषा में मौजूद हैं, उनका अनुवाद किया जाना चाहिए। उदाहरण: गणित में 'कलन'।
● अंतर्राष्ट्रीय शब्दों का समावेश: कुछ अंतर्राष्ट्रीय शब्दों का समावेश किया जाना चाहिए यदि उनका उपयुक्त अर्थ भारतीय परम्परा में विद्यमान हो।
● ध्वनि व्यवस्था का अनुकूलन: अंतर्राष्ट्रीय शब्दावली की ध्वनि व्यवस्था का अनुकूलन हिंदी के अनुसार किया जाए। उदाहरण: Tragedy - 'त्रासदी', Madam - 'मादाम'।
वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग
● महत्वपूर्ण भूमिका: वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, और 5 लाख से अधिक शब्दों का अनुवाद प्रस्तुत कर चुका है।
इन बिंदुओं के माध्यम से हिंदी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की कठिनाइयों और उनके समाधान के प्रयासों को समझा जा सकता है।
● अर्थ की वस्तुनिष्ठता: पारिभाषिक शब्दावली का अर्थ वस्तुनिष्ठ होता है और यह निश्चित क्षेत्र में प्रयोग की जाती है। इसका अभिधार्थ ग्रहण किया जाता है, लक्ष्यार्थ या व्यंग्यार्थ नहीं। उदाहरण के लिए, अर्थशास्त्र में 'मांग और पूर्ति'।
● विषय-सापेक्षता: पारिभाषिक शब्दावली की एक प्रमुख विशेषता इसका विषय-सापेक्ष होना है। जैसे, अर्थशास्त्र के लिए 'मांग और पूर्ति'।
● अर्थों का सूक्ष्मीकरण: पारिभाषिक शब्दावली में अर्थों का सूक्ष्मीकरण होता है, जिससे शब्दों का सही और सटीक अर्थ प्राप्त होता है।
ऐतिहासिक प्रयास
● रघुनाथ पंत: मध्यकाल में रघुनाथ पंत ने राजकीय शब्दावली के निर्माण का प्रयास किया।
● बंगाल सरकार: 1871 में बंगाल सरकार द्वारा एक समिति का गठन किया गया था।
● काशी नागरी प्रचारिणी सभा: 1889 में इस सभा ने 'हिंदी साइंटिफिक ग्लौसरी' का प्रकाशन किया।
● डॉ. रघुवीर: उन्होंने आंग्ल-भारतीय महाकोश प्रकाशित किया और 1955 में राजभाषा आयोग की संस्तुतियों के आधार पर वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग का गठन किया गया।
विवादित मत
● पुनरुत्थानवादी दृष्टिकोण: डॉ. रघुवीर ने अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं के शब्दों को बाहर कर संस्कृत का उपयोग करने पर जोर दिया। उदाहरण: स्टेशन के लिए 'स्थान'।
● लोकवादी दृष्टिकोण: श्री सुंदरलाल का मानना था कि पारिभाषिक शब्दावली सरल होनी चाहिए और हिंदुस्तानी शब्दों के आधार पर निर्मित होनी चाहिए।
● अंतर्राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण: बीरबल साहनी और शांतिस्वरूप भटनागर जैसे वैज्ञानिकों का मानना था कि अंतर्राष्ट्रीय शब्दावली को वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए जैसे उसका प्रयोग विकसित देशों की भाषाओं में होता है।
नीतियाँ और समाधान
● उपयुक्त शब्दों का अनुवाद: जिन शब्दों के लिए उपयुक्त शब्द हमारी भाषा में मौजूद हैं, उनका अनुवाद किया जाना चाहिए। उदाहरण: गणित में 'कलन'।
● अंतर्राष्ट्रीय शब्दों का समावेश: कुछ अंतर्राष्ट्रीय शब्दों का समावेश किया जाना चाहिए यदि उनका उपयुक्त अर्थ भारतीय परम्परा में विद्यमान हो।
● ध्वनि व्यवस्था का अनुकूलन: अंतर्राष्ट्रीय शब्दावली की ध्वनि व्यवस्था का अनुकूलन हिंदी के अनुसार किया जाए। उदाहरण: Tragedy - 'त्रासदी', Madam - 'मादाम'।
वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग
● महत्वपूर्ण भूमिका: वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, और 5 लाख से अधिक शब्दों का अनुवाद प्रस्तुत कर चुका है।
इन बिंदुओं के माध्यम से हिंदी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की कठिनाइयों और उनके समाधान के प्रयासों को समझा जा सकता है।
Conclusion
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में कई कठिनाइयाँ हैं, जैसे कि विभिन्न भाषाओं से शब्दों का अनुवाद, सांस्कृतिक संदर्भों का समावेश और तकनीकी शब्दों की सटीकता। महात्मा गांधी ने कहा था, "भाषा का विकास समाज के विकास से जुड़ा है।" इस दिशा में सी-डैक और राजभाषा विभाग जैसे संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। तकनीकी शब्दावली आयोग के प्रयासों से इन चुनौतियों का समाधान संभव है, जिससे भाषा समृद्ध और सुलभ बनेगी।